Sunday, October 7, 2007

विवशता

कवि !
तेरी कल्पना के
शब्दों के अर्थ
क्या पूर्ण होंगे ?
या यूं ही,
सुबह की ओस की तरह
धूप आते ही
वाष्प बनेंगे।

कवि !
तेरी अभिलाषा
कभी जीवंत हो
रंगेगी
दुनिया को
या यूं ही
इंद्रधनुष सी
पल में गायब होगी।

कवि !
तेरे विचारों का
विस्तृत आंगन
देगा आमंत्रण ?
सद्भाव बन....
या यूं ही
भीड़ रौंदेगी
इन्हें...
और धूल सी
उड़ेगी चारो ओर।

कवि !
तेरे विचारों की तीखापन
भ्रस्ट
विचारों को छेद सकेगा
या यूं ही
उनसे टकराकर
हंसी का पात्र बनेगा ।।

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