Thursday, March 23, 2017

एक सपना और पूरी हकीकत : एक लघु कथा



उम्र 22 से 23 साल के बीच रही होगी।
चेहरे पर हल्की सी दाढ़ी।
सिर पर लंबे बाल बेतरतीब से बिखरे हुए थे। जिन्हें एक गुच्छा बनाकर पीछे की तरफ बांधा गया था।
वो दुबला सा लड़का जूट की रस्सियों से बनी चारपाई पर किसी संजीदा बुजुर्ग की तरह बैठा हुआ था।
लेकिन उसके चेहरे पर तनाव भरी परेशानी थी।
एक खीझ दिख रही थी। वो झुंझलाया सा था।
मैंने पूछ लिया। परेशान क्यों हो आप?
उसने बताया। मैं नास्तिक हूं। मुझे ईश्वर पर भरोसा नहीं है।
लेकिन वो मुझे ईश्वर बनाने पर तुले हुए हैं।
वो कहे जा रहा था। मैंने तो मई 1927 में लाहौर में अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तारी के वक्त भी ईश्वर को याद नहीं किया। तब अंग्रेज अफसर ने सलाह दी थी, अगर सजा से बचना है, तो दो वक्त ईश्वर को याद करूं।
उन्होंने कहा। मैंने बहुत सोच समझकर तय किया है। मैं ईश्वर पर विश्वास और प्रार्थना नहीं कर सकता हूं।
मैंने पूछा - आप कहना क्या चाहते हैं। वो बोले मैं नास्तिक हूं।
मैंने कहा आप ईश्वर को नहीं मानते। कोई ठोस वजह बता सकते हैं। आप नास्तिक क्यों हैं?
इसबार तनाव से भरे चेहरे पर हल्की मुस्कराहट थी। उन्होंने कहा। हिंदू पुनर्जन्म को मानते हैं। एक मुसलमान या ईसाई स्वर्ग मैं फैली समृद्धि को। मैं आलोचना और आजाद ख्याली को पसंद करता हूं क्योंकि ये एक क्रांतिकारी के अनिवार्य गुण हैं। लेकिन वो इन दोनों विचारों के विरोधी हैं।
मैं कहता हूं सिर्फ विश्वास और अंध-विश्वास खतरनाक है। यह दिमाग को मूढ़ और इंसान को प्रतिक्रियावादी बना देता है। जबकि वो कुछ बताए हुए लोगों पर ही विश्वास करते हैं और उनकी बातों पर अंध-विश्वास।
मैंने फिर पूछ लिया। आप नास्तिक क्यों बने?
वो कहने लगे, अगर आपका विश्वास है कि एक सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक और सर्वज्ञानी ईश्वर है, जिसने दुनिया की रचना की, तो कृप्या करके मुझे यह बताएं कि उसने यह रचना क्यों की?
कष्टों और संतापों से पूर्ण दुनिया असंख्य दुखों से ग्रसित। एक भी आदमी पूरी तरह संतुष्ट नहीं है।
उन्होंने कहा। कृप्या यह न कहें कि यही उसका नियम है। यदि वह किसी नियम से बंधा है, तो वो सर्वशक्तिमान नहीं है।
मैं उनकी परेशानी देखकर परेशान हुआ। पर समझ नहीं पाया कि वो इस बात से इतना परेशान क्यों हैं? धर्म तो हर किसी का निजी मसला है।
वो समझ गए थे, मेरे मन में क्या चल रहा है?
उन्होंने जोर देकर समझाया।  मैं अराजकतावादी बाकुनिन, साम्यवाद के पिता मार्क्स,  लेनिन  और त्रात्स्की जैसे लोगों को पढ़कर जवान हुआ हूं। ये सभी नास्तिक थे।
मैं अभी भी नहीं समझ पा रहा था, उनकी दिक्कत क्या है?
उन्होंने कहना शुरू किया।  इसबार वो बिना सांस लिए बोले जा रहे थे।
वो मुझे धर्म के रंग में रंगना चाहते हैं।
वो मंदिर-मस्जिद-गिरजा की दीवारों से घिरे हुए हैं।
वो धर्म, जातियों की परंपरा में जकड़े हुए हैं।
वो धर्म की ऐसी परिभाषा पर विश्वास कर रहे हैं, जो कुछ लोगों ने अपने फायदे के लिए गढ़ी है।
वो राम के नाम पर मुसलमानों से नफरत करते हैं।
मस्जिद के नाम पर मंदिर तोड़ते हैं।
मंदिर के नाम पर मस्जिद गिरा देते हैं।
उनके धर्म का एक रंग है। वो हरे, लाल, नीले, केसरिया रंग में बंटे हैं।
वो देश को धर्म और खास संस्कृति के दायरे में बंद कर देना चाहते हैं।
एक राष्ट्र पर किसी खास धर्म, संस्कृति और भाषा का ठप्पा मार देना चाहते हैं।
अचानक उनका गला भर्रा गया। आवाज रुक गयी। ऐसा लगा जैसे उनके गले के इर्द गिर्द किसी ने फंदा डाल दिया है। हुक हुक की आवाज मेरे कानों से टकराई।
कुछ पल के लिए मैं घबरा गया। मुझे लगा, जैसे वो नौजवान आखिरी सांसे ले रहा है। मैंने पास पड़े चादर से अपना चेहरा ढक लिया। मैं डर से निजात पाने के लिए खुद में सिमट गया। 

मैंने माहौल को कुछ हल्का करने के लिए बीच में ही टोक दिया। पर इन सब बातों से आपको क्या दिक्कत है?
आप नास्तिक हैं, वो ईश्वर को मानते हैं। इससे आपको भला क्या फर्क पड़ता है?
आप बाकुनिन, मार्क्स, लेनिन और त्रात्स्की को पढ़कर विचारवान हुए हैं। और वो मनु, गोलवलकर, किसी मौलाना के फतवे को पढ़ते हैं। तो इसमें आपको क्या दिक्कत?  
वो देश को धर्म, संस्कृति या भाषा के नजरिए से देखते हैं, तो आप परेशान क्यों हैं?
मैंने कहा तो आपको दिक्कत क्या है

इसबार वो मुझे पूरी तरह संतुष्ट करने के अंदाज में बोले। उन्होंने एक सांस में अपनी बात कही। मैं नास्तिक हूं। धर्म, भाषा और खास संस्कृति के दायरे से आजाद। मैं आलोचना और आजाद ख्याली पर भरोसा करता हूं।
वो कह रहे थे दिक्कत ये है कि वो मुझे मूर्ति बनाकर पूजना चाहते हैं। जबकि मैं तो विचार हूं। वो मेरी जय जयकार कर रहे हैं। ऐसा करते हुए, वो सिर्फ मेरी छवि का इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरी छवि को उन्होंने अपने हिसाब से ढाल दिया है। वो मेरे विचार को नहीं अपना रहे, सिर्फ चेहरे का उपयोग कर रहे हैं। 

मैंने बीच में कुछ कहने के इरादे से हाथ उठाया। उन्होंने इशारा करके चुप रहने को कहा।
इस बार उनके चेहरे पर एकसाथ कई भाव थे। एक पल को लगा वो काफी गुस्से में हैं। पर सिसक रहे थे। उनकी आंखो से आंसू की कुछ बूंदें, मेरे चेहरे पर आकर गिर गयी। मै घबराकर उठा। बिस्तर पर इधर उधर हाथ फेरा। कमरे में काला अंधेरा बिखरा हुआ था। दरवाजे की एक दरार से पार्क के बड़े बल्ब की हल्की रोशनी आ रही थी। जिससे कमरे का कुछ हिस्सा चमक रहा था। मैंने माथे पर चू रहे पसीने को पोछा। घड़ी की तरफ देखा। रात के ढाई बज रहे थे।

नौजवान का चेहरा मेरी आंखों में अभी भी घूम रहा था। उसकी छरहरी काया। चेहरे पर हल्की दाढ़ी। सिर पर बेतरतीब बिखरे बाल। और वो खाट जिस पर वो बैठा हुआ था। मेरी आंखों में लगातार घूम रही थी। सामने लगे कैलेंडर पर मेरी नजर गयी। तारीख चमक रही थी - 23 मार्च। और वो लड़का भगत सिंह था। मैं अगले कुछ घंटों तक सो नहीं पाया। सोचने लगा ये सपना था या हकीकत?

Wednesday, March 22, 2017

प्रेम बंद है : एक लघु-कथा



सन 1266 में दिल्ली की गद्दी पर सुल्तान ग्यासुद्दीन बलबन की ताजपोशी हुई।
सुल्तान ने अपने दरबार में हंसने और मजाक करने पर रोक लगा दी।
बड़े ओहदों पर बैठे सरदारों का हंसना मजाक करना बंद हो गया।
धीरे धीरे सल्तनत की आम जनता हंसने से घबराने लगी।
बहुत साल बाद उत्तर देश में एक और राजा हुआ।
राजा को किसी ने बताया दिया था कि छेड़खानी बड़ी समस्या है।
गद्दीनशीन होते ही राजा ने हुक्म सुनाया।
पार्क, बाजार, कॉलेज के आसपास लड़के न दिखाई दें।
कारिंदे जैसे हुक्म के इंतजार में बैठे थे।
प्रेम विरोधी दल बनाए गए।
वो अपनी टोली के साथ पार्क और बाजारों की तरफ निकल पड़े।
पार्क में प्रेमी जोड़े बैठे थे। बाजारों से भी कुछ जोड़े निकल रहे थे।
प्रेम विरोधी दल ने जो सामने दिखा पकड़ लिया।
प्रेमिका के सामने प्रेमी से कान पकड़वाए।
आगे से खुलेआम प्रेम न करने की शपथ दिलवाई।
और सख्त हिदायत के साथ छोड़ दिया।
कुछ लड़के अपने घर की गली के सामने से गुजरते दिखाई दिए।
प्रेम विरोधी दल ने तुरंत पकड़ा।
सवाल पूछे यहां क्या कर रहे हो
लड़के सकपका गए ....म मेरा घर है यहां
प्रेम विरोधी दलका लीडर कड़क आवाज में बोलासाबित करो
प्रेम विरोधी दल पर राजा के हुक्म को तामील कराने की जिम्मेदारी थी।
धीरे धीरे कॉलेज, पार्क, बाजारों से लड़के गायब हो गए।
प्रेमी अपनी प्रेमिकाओं के साथ घर से बाहर निकलने से घबराने लगे।
ये सिलसिला लंबा चला।
धीरे धीरे उत्तर देश में प्रेम खत्म हो गया।
राजा अपनी इस उपलब्धि पर धीरे से मुस्कराया।
मंत्री हंसने लगे।
कारिंदे जोर से हंसे।
और राजा के चाहने वाले ठहाके लगा रहे थे। 

(डिसक्लेमर : ये कहानी और इसके पात्र काल्पनिक हैं‍, इनका किसी की निजी जिंदगी से मिलता जुलता होना एक संयोग हो सकता है। कुछ बातें इतिहास से ली गयी हैं। )

Thursday, January 16, 2014

'आप' का पहला सबक

आम आदमी पार्टी का सामना पहली बड़ी सियासी मुश्किल से हुआ है। विरोध में न बीजेपी खड़ी है, न ही कांग्रेस है। सामने अपने खड़े हैं। वो अपने जिन्होंने आम आदमी पार्टी के पैदा होते बनते देखा।
इस सियासी मुश्किल के पीछे बेशक सियासी महत्वाकांक्षाएं हैं। विनोद कुमार बिन्नी पार्षद से विधायक बने, अब वो सांसद बनने का ख्वाब देख रहे हैं। ये ख्वाब देखने वाले आम आदमी पार्टी में वो अकेले नहीं हैं। दिल्ली में ऐसा ख्वाब कई और "आम आदमियों" की आंखों में भी है। कई इसके लिए लाखों रुपए की नौकरी छोड़कर आए हैं।
दरअसल दिल्ली ही वो मैदान है, जहां पर आम आदमी पार्टी से लोकसभा टिकट मिलने का मतलब काफी हद तक जीत की गारंटी हो सकता है। इसलिए इस पके आम को लपकने की कोशिश में हर छोटा और बड़ा "आम आदमी" लगा है।
ऐसे में राजनीतिक महत्वाकांक्षा में पले बढ़े बिन्नी ने ये कोशिश की तो हैरानी क्या है?
पर कुछ सवाल खड़े हो रहे हैं? जो आम आदमी पार्टी की बढ़ती लहर से पैदा हुए हैं। क्या बिन्नी का इस तरह पार्टी के खिलाफ खड़े हो जाना और केजरीवाल सहित पार्टी की विचारधारा को कोसना साधारण बात है? वो भी तब जब वो इस पार्टी के दम पर विधायक बने।
मुझे लगता है, ये सियासी खेल इतना सीधा तो नहीं है। केजरीवाल की बढ़ती ताकत ने सबसे ज़्यादा बीजेपी को बेचैन किया है। मोदी इससे ज़्यादा परेशान हैं। बात सीधी है, अगर केजरीवाल और आम आदमी पार्टी ऐसे ही चलती रहे, तो उसकी ताकत और लहर बढ़ना तय है। जाहिर है ऐसे में दस साल बाद बीजेपी के सत्ता में वापसी का सपना टूट सकता है। मोदी की सालों पुरानी आकांक्षा केजरीवाल तोड़ने की स्थिति में आ गए हैं।
तो क्या ये संभव नहीं... जैसा कि आम आदमी पार्टी के मुख्य प्रवक्ता योगेंद्र यादव ने भी कहा, कि बिन्नी बीजेपी के हाथों का खिलौना बन गए हैं????
बीजेपी हो या कांग्रेस ऐसे खेल में माहिर रही हैं। ऐसा करने के दो फायदे बीजेपी को हो सकते हैं। पहला, सीधा फायदा उन्हें लोकसभा चुनावों में मिल सकता है। बिन्नी की हरकतों से उस आम आदमी की सोच प्रभावित हो सकती है, जो आम आदमी पार्टी को वोट देने का मन बना रहा था। अगर ये सोच प्रभावित हुई, तो फिर उसके लिए विकल्प बीजेपी और मोदी ही हो सकते हैं। क्योंकि मौजूदा हालात में कांग्रेस का कोई चांस दिख नहीं रहा है। यानी बिन्नी नाम की कठपुतली के धागे बीजेपी के हाथ में होने का मतलब लोकसभा चुनाव में बड़ा फायदा हो सकता है।

(लगता तो ये भी है कि बीजेपी... आम आदमी पार्टी के ऐसे और बिन्नियों के संपर्क में भी हो। आने वाले दिनों में कुछ और बिन्नी बम फूटें तो अचरच नहीं होना चाहिए।  )

खैर बीजेपी को होने वाले दूसरे फायदे की बात करते हैं। बीजेपी को दूसरा फायदा दिल्ली में होगा। जिसका इस्तेमाल बीजेपी लोकसभा चुनावों के बाद कर सकती है। बीजेपी के पास 32 विधायक हैं। एक निर्दलीय विधायक भी बीजेपी को समर्थन दे रहे हैं। इस तरह आंकड़ा 33 का है। अब अगर बिन्नी बीजेपी के इशारों पर नाच रहे हैं, तो बीजेपी का आंकड़ा 34 हो जाएगा। इस तरह बीजेपी को सिर्फ 2 और विधायकों की ज़रूरत रह जाएगी। जिसका जुगाड़ करना आसान होगा।

लेकिन चिंता बीजेपी, कांग्रेस और आम आदमी पार्टी जो अब सियासी है... कि नहीं है। चिंता उस आम आदमी के भरोसे की है, जो कुछ लोगों से उम्मीदें लगा बैठा है। ये उम्मीदें इतनी जल्दी टूटीं, तो फिर ये आम आदमी लंबे अरसे तक किसी भी बदलाव पर भरोसा नहीं कर पाएगा। आम आदमी पार्टी और केजरीवाल को यही समझना होगा।

Friday, January 10, 2014

सैफई में समाजवाद नाचा

दो हफ्ते के तमाशे के बाद यूपी का सैफई महोत्सव खत्म हो गया। समापन समारोह के लिए अखिलेश सरकार ने 50 सितारों को नाचने-गाने लिए बुलाया था। जिस राज्य के हजारों लोग दंगे के बाद बेघर हो गए उसका युवा मुख्यमंत्री बेफिक्र दिखाई दे रहा था। सैफई जश्न में जागता रहा और मुजफ्फरनगर राहत कैंप के लोग ठंड से ठिठुरते रहे।

सैफई में 300 करोड़ रुपए का नाच गाना और जश्न, 400 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित कैंप में सन्नाटा। सैफई में सलमान के डांस पर खूब शोर मचा, दंगा पीड़ित कैंप में लोगों का दर्द रात के सन्नाटे में दिल चीर गया। सैफई में माधुरी के एक एक ठुमके पर तालियां बजी, कैंप की सर्द रात में ठिठुरते बच्चों की आवाज सुनाई दी। मल्लिका के डांस पर सीटियां बजी, दंगा पीड़ित कैंप से 34 माओं की टीस सुनाई दी, जिनके बच्चे सर्दी में कांप कांपकर मर गए। सैफई में जो हुआ उसे यूपी की अखिलेश सरकार ने बहुत गौर से देखा और मजे लेकर सुना। मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित कैंपों का सन्नाटा, दर्द, ठिठुरते बच्चों की आवाज, बच्चों को खोने वाली माओं की टीस हुक्मरानों को नहीं सुनाई दी। ये सब हुआ राम मनोहर लोहिया की शिष्य रहे समाजवादी मुलायम सिंह यादव के बेटे के राज में। सवाल तो होने ही थे, लोगों ने पूछा लोहिया के चेले के रहते ये कैसे हुआ? 

मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित कैंप में बच्चे, बुजुर्ग और महिलायें ठंड में कांप रहे हैं। मुजफ्फरनगर से 400 किलोमीटर दूर अखिलेश- मुलायम का गांव जश्न मना रहा था। करोड़ों की लाइटिंग और करोड़ों के सितारों के बीच सैफई में यूपी सरकार ने गर्मी महसूस की, लेकिन दंगा पीड़ित कैंप के अंदर बच्चे सुबह के इंतजार में थे। वो रात भर गिनती गिनते रहे, ताकि सुबह सूरज निकले और वो धूप ताप सकें। समाजवाद का ऐसा नजारा तो यूपी ने पहली बार देखा।

यूपी की गरीब जनता ने आगरा की मुगलिया सल्तनत के ठाठबाट नही देखे होंगे। रामपुर के नवाबों को भी अरसा बीत गया, लेकिन 2014 में बेचारी जनता ने एक अलग राज देखा। यूपी के सीएम अखिलेश सैफई में राजा बन गए। तमाम मंत्री तो इर्द गिर्द फैले ही थे। अफसरों की फौज दासों की तरह पलक झपकने का इंतजार करती सी दिखी। जैसे राजा को कोई कष्ट हो, तो वो पलक पावड़े बिछा देंगे। 

मुज़फ्फनगर के कैंप में 4,783 दंगा पीड़ित अपना घरबार लुटा कर जैसे-तैसे गुजर बसर कर रहे हैं। 34 मासूम इसलिए मर गए, क्योंकि ठंड से बचने के इंतजाम नहीं थे। इसपर कुछ लाख रुपए खर्च होते तो मासूम बच जाते, लेकिन सरकार सैफई महोत्सव की रुपरेखा बनाने में लगी रही। जिसका प्लान तीन सौ करोड़ रुपए का था। मुलायम सिंह ताल ठोककर कहते हैं कि वो लोहिया के चेले हैं। पर ऐसी सीख तो लोहिया की नहीं थी। लोहिया की आत्मा सैफई का नाच और मुजफ्फरनगर का दर्द देखकर रोई ज़रूर होगी। 

Tuesday, January 7, 2014

चुनाव के लिए नया लॉलीपॉप

इन दिनों बीजेपी चुनाव के लिए नया लॉलीपॉप तैयार कर रही है... नाम है "बैंक ट्रांजेक्शन टैक्स"
दावा है कि इनकम टैक्स, सेल्स टैक्स, वैट, एक्साइड ड्यूटी और न जाने क्या क्या... सभी की जगह "बैंक ट्रांजेक्शन टैक्स" ले लेगा.. सुनने में बहुत मीठा है ये लॉलीपॉप....पर कैसे लागू होगा? कोई नहीं जानता ?
वैसे ये ज्यादती होगी... कि अभी से सवाल खड़े किए जाएं....

पर कुछ तथ्यों पर गौर करना ठीक रहेगा

(इन आंकड़ों में कुछ फेरबदल संभव है)

भारत में सभी तरह के बैंकों की संख्या 170 के करीब है।
80 - क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, 27 - राष्ट्रीय बैंक, 31 - प्राइवेट बैंक, 32 - विदेशी बैंक
इन बैंकों की ब्रांचों की संख्या 53,000 के करीब है, मतलब ये कि औसतम 25,000 लोगों पर सिर्फ एक ब्रांच है।

2005 के एक अनुमान के मुताबिक भारत में सिर्फ 31 करोड़ लोगों के पास ही बैंक खाते थे, जिनमें से कई लोगों के पास दो या इससे ज्यादा खाते भी थे... इस तरह सिर्फ 20 करोड़ लोगों के पास ही बैंक खाते थे... अगर आज आठ साल बाद बैंक खाते दोगुने भी हो गए होंगे.. तो भी करीब 40 करोड़ लोगों के पास ही बैंक खाते होंगे... यानी अभी भी अस्सी करोड़ से ज़्यादा लोगों के पास बैंक खाते नहीं हैं... यानि 65 फीसदी लोगों के पास बैंक खाते नहीं है।

जब बैंक खाते नहीं होंगे... तो "ट्रांजेक्शन" का हिसाब किताब कैसे रखा जाएगा?
जाहिर है ऐसे में "बैंक ट्रांजेक्शन टैक्स" लगाने में व्यावहारिक दिक्कत आएगी... जाहिर है बीजेपी जो सपना दिखा रही है, वो हाल फिलहाल तो लागू नहीं किया जा सकता।

चुनाव में ऐसी ही सपने केजरीवाल ने भी दिखाए थे।

Saturday, August 14, 2010

नत्था नहीं, हम मर रहे हैं


६ महीने हो गए, ब्लॉग पर उंगलियां चल ही नहीं पा रही थी, दिमाग में सवाल आते थे, पर यहां आते-आते जैसे धुंधले पड़ जाते, लेकिन इस फिल्म ने फिर से सवाल खड़े कर दिए, मेरे अंदर।


पिपली लाइव देखकर लौटा हूं, सोच रहा हूं कि एक कहानी जब पर्दे पर देखी जाती है, तो कितनी वीभत्स लग सकती है। पर हमारे इर्दगिर्द न जाने कितने ही नत्था मर रहे हैं, पता ही नहीं चलता। सिस्टम के फेल होने का हवाला कौन देता है? नत्था नहीं देता, न बुधिया देता है..... वो तो समझ ही नहीं पाता कि सिस्टम क्या चालबाज़ियां कर रहा है। और जो समझते हैं, वो शहरों को निकल आते हैं। पहले नौकरी, फिर एक फ्लैट... और फिर एक कार..... और हफ्ते में मिलने वाली छुट्टी पर एक फिल्म... पिपली लाइव जैसी। कभी कभार सिस्टम के फेल हो जाने पर चर्चा और फिर अगले ही पल सबकुछ भूल जाना।

सिस्टम सुधरेगा या हम ?

----------------------

लेकिन सिस्टम को कोसना तो समस्या का हल नहीं हो सकता, दरअसल हममें और नत्था में कोई बड़ा अंतर नहीं है। नत्था दो वक्त की रोटी पाना चाहता है, और उसके लिए... जो कुछ हो सकता है, करने की कोशिश कर रहा है। और हममे में से ज़्यादातर भी ऐसा ही कर रहे हैं।


फिल्म ऊपर से देखने में नत्था के मरने की कहानी ज़रुर लग सकती है, लेकिन मरता कौन है.... , सरकार , राजनीति या फिर मीडिया ? या तीनों मर रहे हैं, धीरे-धीरे।


गांव में पानी नहीं है, खेती कैसे होगी? और ये क्या पिपली गांव की कहानी है, देश के लाखों गांव इसी हालत में नहीं हैं, क्या? एक छोटे से सवाल को बड़ा कैसे किया जा सकता है, ये राजनीति और सत्ता बखूबी जानती है.... और इस काम को मीडिया नमक मिर्च लगाने को तैयार है ही।

नत्था बच गया, पर और भी हैं....

------------------------------

नत्था पिपली लाइव में बच गया। लेकिन देश के लाखों करोड़ों नत्थों का बचना मुश्किल है। वो बचेंगे कैसे? जबकि सरकारी योजनाएं वक्त पड़ने पर ज़रुरतमंद के काम नहीं आती, वैसे ही जैसे सरकारी अस्पताल वक्त पड़ने पर बीमार के काम नहीं आते, पुलिस पीड़ित के काम नहीं आती, आम आदमी के वोट से विधानसभा या संसद पहुंचा नेता आम आदमी के काम नहीं आता। और देश दुनिया को सच दिखाने की कसम खाने वाला मीडिया सच नहीं दिखाता।


कौन बदलेगा सूरत? राजनीति, सरकार या मीडिया ? सवाल बेमानी है

------------------------------------------------

फिर उम्मीद कहां बचती है? क्या बदलाव की कोई सूरत नहीं है, क्या पूरा देश पिपली गांव बन जाएगा। या फिर हम सब अपने नेता, अपनी सरकार, अपना मीडिया ख़ुद बन जाएं। क्या हम कल से डरना छोड़ेंगे। क्या हम अपनी नौकरी खोने का डर छोड़ेंगे। क्या हम एक सच बोलने से होने वाले ख़तरों को मोल लेने की हिम्मत दिखा पाएंगे?

जनता के नाम पर क्या-क्या ?

-----------------------------

हॉलीवुड की फिल्म लॉयन्स फॉर लैम्ब में प्रोफेसर अपने छात्र से कहता है, कि अगर आप बदलाव के लिए तैयार नहीं होओगे तो आने वाला वक्त तुम्हें कोसेगा। वहां भी सत्ता जनता को डराती है, उनके सामने झूठे डर पेश करती है, मसलन इराक पर हमला क्यों ठीक है? इसमें जनता के क्या फायदे छिपे हैं.... और ये भी कि देश के हित के लिए लोगों को अपनी शहादत तो देनी ही पड़ती है। लेकिन ये समस्याएं खड़ी कौन करता है? कूटनीति और शासन नीति, नेता राजनेता या फिर आम आदमी.... नत्था जैसा आम आदमी?


मीडिया का चरित्र सुधरेगा क्या ?

------------------------------

आपको कैसा लग रहा है? ये सवाल चिढ़ाता नहीं है क्या? एक सीधी सी बात के मीडिया के अपने मतलब क्यों होते हैं? पिपली लाइव देखते हुए, महसूस होता है कि मीडिया ने खुद को कितना हास्यास्पद बना लिया है। बचकाने सवाल, टीआरपी तो दिला सकते हैं, लेकिन मीडिया को सड़ा रहे हैं।


यूं तो रोने के लिए बहुत कुछ है, पर फिल्म बेहतरीन लगती है। संवाद, साधारण स्थितियों को कैसे असाधारण बनाया जा सकता है, फिल्म में कमाल तरीके से दिखाया गया है। सरकार, राजनेती और मीडिया का चरित्र.. क्या कहने। और संगीत भी बेमिसाल है।

Sunday, March 7, 2010

आज महिला दिवस है

मां को
जिसने मेरे लिए
सहे न जाने कितने दर्द
बहन को
जिसने बिना किसी शर्त
मेरी सारी बात मानी
और उन सबको
जो बिन चाहे मिले
एक सपना भर गए मेरी अधजगी आंखो में
दिल में धड़कनें जगाई
और मेरी थमी थमी राहों को दे गए रफ्तार
वो जो बहुत करीब आए बिन चाहे
और बादल की तरह बरस कर गुम हो गए
वो भी जिनसे कभी नहीं मिला
पर जिनकी कहानियां सुनता हूं
और जो मुझे मेरी मां की याद दिलाती हैं

उन सभी को महिला दिवस पर
एक शब्द 'नमन' ।।