Thursday, February 19, 2009

गांव

ये सच है
कहानी नहीं।
ज़िंदगी के पैरों पर
कांटों के घाव हैं।

आंखों से खून नहीं
आंसू ही निकलते हैं,
आह भी फूटती है, यहां।

याचना के शब्दों में,
काव्य नहीं होता है, यहां
यथार्थ होता है, जीवन का।

दिल में प्यार और करुणा
जीवन की अंतिम सांस तक
पहरा देते हैं।

और कभी जब
ईर्ष्या के बादल फटते हैं
तब, फसल बहती है
जीवन भर की।

यहां, दो अर्थों में बात नहीं होती
सीधे-सरल सच्चे शब्द
जैसे होते हैं, वास्तविक से
मुंह का दरवाजा धकेल कर
आ जाते हैं
चाय के प्याले संग
या फिर, चिलम उड़ाती है
अपने धुएं के साथ।

यहां, बचपन-जवानी और बुढ़ापे के
अलग-अलग सिद्धांत
नहीं
होते

जीवन बंधा होता है
एक ही डोर से।।

(8 सिंतबर, 2001------- ये कविता मैंने 8 सितंबर, 2001 में लिखी थी। करीब आठ साल तक मैंने इसे डायरी के पन्नों में सहेज कर रखा। पुराने पन्ने पलटते हुए एकबार फिर से इस पर नज़र पड़ गयी। सोचा, क्यों ना इसे आपके सामने रख दूं। ये आठ साल पुरानी बात है, मैं तब कॉलेज में था, ज़ाहिर है.... तब से अब तक सोच में कई बदलाव भी आए हैं। लेकिन पुरानी बातों को आज के शब्द में रखकर शायद हम पुराने वक्त को नहीं टटोल सकते। इसलिए वही पुरानी कविता, जब मैं आठ साल छोटा था, पूरी की पूरी लिख डाली है। )

1 comment:

vishal said...

बहुत ही अच्छे ढंग से गाँव को परिभाषित किया है जीतेंद्र जी। भावनाओं को यदि मापने का कोई पैरामीटर होता तो जरूर टिप्पणी की जा सकती इस रचना पर।