Thursday, February 19, 2009

तुम सब हार जाओ....

संसद । जब ये शब्द सुनाई पड़ता है, तो सोचिए आपके-हमारे ज़ेहन में क्या तस्वीर उभरती है।.... हल्के लाल... गुलाबी पत्थरों से बनी एक घुमावदार इमारत।.... ऐसा बचपन में होता था, जब भी संसद की बात होती, दिमाग में यही घुमावदार विशाल इमारत का नक्शा घुमने लगता। थोड़ा बड़ा हुआ तो टीवी पर प्रश्नकाल की बहस देखने की एक आदत सी लग गयी। लेकिन अब संसद का नाम लेने पर संसद भवन की तस्वीर के रुप में वो घुमावदार इमारत का नक्शा नहीं दिखता।.... अब मामला दूसरा है, अब जब भी संसद की बात होती है, तो हंगामा करते सांसद दिमाग में घूमने लगते हैं।
हंगामा करते ऐसे सांसद जिन्हें किसी की भी परवाह नहीं। ना देश की, ना देश की जनता की। जब वो जनता की परवाह नहीं करते, तो फिर उनके सामने स्पीकर क्या चीज़।... अगर स्पीकर की वो परवाह करते, तो फिर स्पीकर को क्यों कहना पड़ा, मैं चाहूंगा कि आप सब लोग अगले चुनाव में हार जाएं। स्पीकर सांसदों के व्यवहार से इतने व्यथित हुए, कि उन्होने कहा कि उनके पास सांसदों की इस अनुशासनहीनता के बारे में कहने के लिए शब्द नहीं हैं, पर वो समझते हैं कि ये बहुत निंदनीय है।..... स्पीकर ने सांसदों को चेताया कि अगर वो सदन में ऐसे ही हंगामा करते रहे, तो जनता उनके बारे में फैसला ज़रुर करेगी।
स्पीकर ने ऐसा भावावेश में नहीं कहा होगा। वे बड़े राजनेता हैं, 1971 से करीब चार दशक हो गए, उन्हें राजनीति करते हुए। 9 बार संसद में पहुंच चुके हैं, सोमनाथ चटर्जी। ज़ाहिर सी बात है, कि ये महज़ आंकड़ा नहीं है, इससे सोमनाथ चटर्जी का व्यक्तिव बना है।
यही अनुभव और यही व्यक्तिव उन्हें चार दशक तक अपनी पार्टी से जुड़ा होने के बावजूद उसके खिलाफ खड़ा होने की ताकत देता है। सोमनाथ जानते हैं कि बहस का लोकतंत्र में क्या मतलब होता है। ऐसा नहीं कि वो सदन में बहस के विरोधी हैं, पर बहस की एक मर्यादा तो होनी ही चाहिए।....... यही सोमनाथ चटर्जी बतौर स्पीकर दूसरे सांसदों से चाहते हैं।
बतौर स्पीकर सोमनाथ चटर्जी सदन में सांसदों के साथ अधिक कड़ाई नहीं कर सकते। लेकिन जनता के हाथ में वोट की ताकत है। और ऐसे समय में जब चुनाव बिल्कुल नजदीक हैं, हमें अपनी ताकत को समझना चाहिए।...... फिर सोमनाथ चटर्जी की वो बात भी याद रखनी होगी, जिसमें उन्होने सांसदों से कहा था............. इंतज़ार करो, आने वाले चुनाव में जनता तुम्हें सबक सिखाएगी।

1 comment:

Udan Tashtari said...

चेहरे बदलने से तो कुछ हासिल नहीं - जब तक फितरत न बदले.