Tuesday, March 17, 2009

मैं ही तुम्हारे काबिल ना था

अब उस रास्ते ना कभी जाऊंगा
जहां कभी गुल-ए-बाग थे
लोग कहते हैं फूल अब भी हैं
मगर मेरी वीरानी मेरे साथ है ।।

ख़ुदा उन बागीचों को और आबाद करे
जहां पल दो पल गुजारे थे
माफ करना फूलों कलियों
मैं ही तुम्हारे काबिल ना था ।।

3 comments:

अनिल कान्त : said...

itna dukh....

विनय said...

waah saahab, bahut khoob!

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चाँद, बादल और शाम
गुलाबी कोंपलें

दिगम्बर नासवा said...

ख़ुदा उन बागीचों को और आबाद करे
जहां पल दो पल गुजारे थे
माफ करना फूलों कलियों
मैं ही तुम्हारे काबिल ना था

वाह जनाब.........
बहुत खूब लिखा है, दर्द की दास्ताँ है आपकी रचना