हिमाल : अपना-पहाड़

बस एक कामना, हिम जैसा हो जाए मन

Monday, March 9, 2009

जब मां मनाती थी होली...

होली का सिर्फ एक दिन बचा है। पिछले सात सालों से लगातार ऐसा हो रहा है, कि रंग चेहरे से तुरंत उतर जाते हैं। रंग उतने पक्के नहीं रहे। ये गांव से शहर आने के बाद ही शुरू हुआ। वरना जब गांव में था, तो रंग उतारे नहीं उतरता था।..... सोचता हूं उन रंगों में क्या था ऐसा ?

सात साल पहले मैं पढ़ लिखकर शहर की ओर भागा। लगा कि खुशहाली मेरे साथ होगी।.... खुशहाली की मायनों में आई भी है। लेकिन बहुत कुछ खोना भी पड़ रहा है।...... वैसे मैं अकेला नहीं हूं, जो इस व्यथा को भोग रहा है।.... हम सब जो अपनी जड़ों से उखड़ कर शहर में जड़ें तलाश रहे हैं..... उन सबकी कहानी है ये। ...... ज़ाहिर है शहर में रंगों की कमी नहीं है।..... दुकानें तरह-तरह के रंगों से भरी पड़ी हैं।..... लेकिन चेहरे पर बिना पूछे जबरदस्ती रंग लगा देने का अधिकार यहां किसी को नहीं है।...... अधिकार के साथ उसमें प्यार का रंग भी था, यहां वो नहीं है।

खैर, इस बार होली के दिन घर जाने का मौका मिला है। दो दिनों के लिए ही सही.... होली घर पर ही मनेगी। ज़ाहिर है मौका पिछली होली को याद करने का है। ..... ऐसे में सोच रहा हूं कि मां होली कैसे मनाती थी ?
कुमांऊ में होली की ख़ास परंपरा है.....पुरुषों की होली... महिलाओं की होली।.... खड़ी होली .... बैठक होली।........ होली मनाने के कई बहाने यहां लोगों के पास हैं।..... जब से मर्द काम के सिलसिले में गांव छोड़-छोड़कर शहरों की ओर भाग रहे हैं...... होली की परंपरा को बचाने का बड़ा जिम्मा महिलाओं के हाथों में है।
मेरी मां भी हर साल हमारे घर पर होली का आयोजन करवाती थी। तब मैं छोटा था, ज़ाहिर है घर पर कोई कार्यक्रम हो तो काम बढ़ जाता है। ऐसे में मां ढेर सारा काम बता देती। साफ सफाई से लेकर घर पर होली के लिए आने वाले मेहमानों की आव-भगत की तमाम ज़िम्मेदारियां।....... हमारे घर में ये होली.... जिसे लोग बैठक होली कहते हैं..... रंग वाली होली यानि छलड़ी से एक-दो दिन पहले होती थी।

मां दो दिन पहले से होली के इस आयोजन में जुट जाती। आने वाले लोगों के खाने का इंतजाम होने लगता। लोगों को क्या-क्या खिलाया जाएगा, इसकी लिस्ट बनाई जाती। फिर मेहमानों को निमंत्रण देने का काम मुझ जैसे बाल ब्रिगेड के जिम्मे आ जाता।..... हम लोग उत्साह के साथ घूम-घूमकर लोगों के घर जाते, और उन्हें बताते की कल हमारे घर पर बैठक होली है।

फिर बैठक होली के दिन भी मां ढेर सारे काम हम पर थोप देती। साफ-सफाई..... रंग घोलना..... बर्तन साफ करना..... मेहमानों के लिए बनने वाली सब्ज़ी साफ करना आदि-आदि। ......... इन सब कामों में मेरी दिलचस्पी कम ही हुआ करती थी। ज़ाहिर है फिर मां से बहस होती.... और कभी कभी मां की गाली भी खानी पड़ती।...... लेकिन अब जब ये सब देखने को नहीं मिलता.... तो सोचता हूं कि वो दिन ही अच्छे थे। मां की गाली में भी एक रंग था। ..... ये रंग काफी देर तक मुझ पर असर करता था।..... अब मैं बड़ा हो गया हूं...... मां मुझे नहीं डांटती।..... पता नहीं वो क्यों बदल गयी है ?.... अब वो गाली भी नहीं देती। ... शायद सोचती होगी कि मैं शहर में रहता हूं...... और ज़्यादा सभ्य हूं।.... शायद वो भी ये सब करके खुद को मेरे करीब लाने की कोशिश कर रही है।

मैं बात कर रहा था..... अपने घर में होने वाली बैठक होली की।...... सारी तैयारियों के बाद दोपहर करीब एक-दो बजे गांव की महिलाएं हमारे घर पर पहुंचना शुरू हो जाती। और फिर औरतों के इकट्ठा होती ही महफिल जम जाती। ..... ढोल, मजीरा..... और तालियों की गूंज के साथ होली के गीत गाए जाने लगते।

सबसे पहले भगवान का नाम लिया जाता। भगवान को समर्पित करते हुए होली की शुरूआत होती।..... औरतें गातीं।

सिद्धी को दाता विघ्न विनाशन
होली खेलें गिरिजापति नंदन
लाओ भवानी अक्षत चंदन
होली खेलें गिरिजापति नंदन
मोतियन से चौक पुराए
होली खेलें गिरिजापति नंदन
सिद्धि को दाता विघ्न विनाशन
होली खेलें गिरिजापति नंदन
थाल सजे हैं अंजन-कंचन
डमरु बजाएं शिवजी विभूषण
होली खेलें गिरिजापति नंदन ।।

...... होली के गीतों के बीच औरतें कभी-कभी स्वांग भी रचती। .... हंसी ठिठोली भी होती। ..... और फिर तीन-चार घंटे मस्ती भरे माहौल के बाद खाने-पीने का काम शुरु होता।............... खाने के बाद भी एक काम रह गया है।........ औरते खाते ही अपने-अपने घरों को जाती नहीं।............. बल्कि अंत में होता है होली का शुभ गीत।

औरतें एक साथ गाती हैं.......

सावरी रंग डालो भीगावन को
केसरी रंग डालो भीगावन को
गणपति जीवैं लाख बरिसा
रामजी जीवैं लाख बरिसा
लक्ष्मण जीवैं लाख बरिसा
उनकी नारी रंग भरी
सावरी रंग डालो भीगावन को
केसरी रंग डालो भीगावन कों।।


एक और आशीष गीत है..... जो अंत में गाया जाता है।

सावल रुप कन्हैया, रंग में राजी रहो जी
ये गांव को भूमिया जी रौ लाख बरिसा
रंग मे राजी रहो जी।
ये गांव का देवी जी रौ लाख बरिसा
रंग मे राजी रहो जी।
ये गांव का पधान जी रौ लाख बरिसा
रंग मे राजी रहो जी।
यो घर का बुजुर्ग- सब जी रौ लाख बरिसा
रंग मे राजी रहो जी।
हम सब जीवें लाख बरिसा
रंग मे राजी रहो जी।।

इसी के साथ हंसते गाते हमारे घर में बैठक होली का समापन होती।............... अब बस यादें शेष हैं।.... इस होली में मैं घर पर होऊंगा..... देखे पिछले सात सालों में क्या-क्या बदल गया है ?
आप सभी को होली की ढेर सारी शुभकामना।

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3 Comments:

At March 9, 2009 at 8:46 PM , Blogger अक्षत विचार said...

आपको होली की ढेर सारी शुभकामनायें...

 
At March 9, 2009 at 10:12 PM , Blogger नीरज गोस्वामी said...

हम से लोग जो अपने शहर से दूर हैं आप की बात को अच्छे से समझ सकते हैं...परंपरागत होली अब सिर्फ दूर दराज़ के ईलाकों में ही रह गयी है जहाँ अभी भी जीवन शांत और सौम्य है...जहाँ जीने के लिए घडी से जद्दो जहद नहीं करनी पड़ती..बहुत रोचक संस्मरण लिखा है आपने...
आपको होली की शुभकामनाएं.

नीरज

 
At March 10, 2009 at 1:59 AM , Blogger शोभा said...

सुन्दर प्रस्तुति। होली की शुभकामनाएँ।

 

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