Saturday, March 21, 2009

हमारी कहानी कौन सुनाएगा ?

  • दुनिया के सबसे बड़े बैंकों में से एक सिटीग्रुप ने ७५ हज़ार लोगों को निकाला।
  • अमरीका की कार कंपनी जनरल मोटर्स ने ४७ हज़ार लोगों की छंटनी की घोषणा की।
  • विमान कंपनी बोइंग ने इस साल ४५०० नौकरियां घटाने की घोषणा की।
  • ब्रिटेन की दूरसंचार क्षेत्र की सबसे बड़ी कंपनी ब्रिटिश टेलीकॉम (बीटी) ने १० हज़ार लोगों की छंटनी की घोषणा की।
  • कसीनो चलाने वाली बड़ी कंपनी लास वेगास सैंड्स ने मकाऊ में कैसीनो बनाने का काम रोक दिया, जिसके बाद ११ हज़ार लोगों की नौकरी ख़तरे में पड़ी।
  • दुनिया की दिग्गज मोबाइल फोन निर्माता कंपनी नोकिया 1700 कर्मचारियों की छंटनी करेगी।
  • कंप्यूटर और सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र की प्रमुख आईटी कंपनी डेल घाटे के बाद एशिया क्षेत्र में छंटनी कर 4 अरब डॉलर की बचत करेगी।
  • जापान की इलेक्ट्रॉनिक उपकरण निर्माता कंपनी सोनी 350 लोगों की छंटनी करेगी।
  • आईबीएम 4600 लोगों की छंटनी करेगा।

ये है, समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया द्वारा छंटनी पर प्रकाशित और प्रसारित ख़बरों की हेडलाइन्स। पहले मंदी और फिर छंटनी पर मीडिया ने लगातार कवरेज दी है। पिछले साल अक्टूबर की ही बात है, जेट एयरवेज़ की छंटनी के वक्त मीडिया ने किस तरह काम किया। भारत की सबसे बड़ी विमानन कंपनी जेट एयरवेज़ ने जब अपने 1900 कर्मचारियों को नौकरियां ख़त्म करने का नोटिस थमाया तो मीडिया ही था... जो आवाज़ बना। काफी बवाल मचा, और मजबूरन जेट एयरवेज़ को अपने कर्मचारियों की नौकरी बहाल करनी पड़ी।

लोगों ने इस काम के लिए मीडिया की जमकर तारीफ की। मीडिया के हम लोगों ने भी अपनी पीठ ठोकी। और कहा, हम सामाजिक सरोकारों से जुड़े हैं। हमने ताल ठोककर ये भी कहा कि हम लोग समाज की सच्चाई दिखाते हैं। और ऐसे लोगों का पक्ष लेते हैं, जिनकी रोजी रोटी पर संकट आ गया हो। बात ठीक भी है, हम लोग ऐसा करते भी हैं। मीडिया ने वक्त बेवक्त अपनी भूमिका का बखूबी निर्वाह किया है।

लेकिन मीडिया एक जगह आकर चुप क्यों हो जाता है ? आप पूछेंगे, वो कौन सी जगह है... जहां हमारी सारी ताकत बेअसर हो जाती है ? बड़े-बड़े पत्रकारों की कलम जवाब देने लगती है। नेताओं के मुंह में माइक घुसेड़कर जवाब उगलवाने वाले भी चुप नज़र आते हैं। यहां आकर पत्रकार पत्रकारिता के सारे सिद्धांत भूल क्यों जाते हैं ? निडर पत्रकारिता की बात करने वाले जांबाज़ पत्रकारों को भी डर लगने लगता है।

दरअसल पूरी दुनिया जहान की परेशानियों के जवाब ढूंढने वाले हम पत्रकार अपनी ही परेशानियों की कभी बात नहीं कर पाते। हमारी नौकरी पर संकट हो तो कोई ख़बर कभी नहीं बनती। पत्रकारों की नौकरी चली जाए, तो कोई आवाज़ नहीं उठाता। ...... हाल फिलहाल के महीनों में अख़बारों, टीवी न्यूज़ चैनलों और वेबसाइटों ने सैकड़ों पत्रकारों को नोटिस थमाकर काम पर आने से रोक दिया।.... सैकड़ों पत्रकार रातों रात बेरोजगार हो गए। लेकिन छंटनी को हेडलाइन बनाने वाले मीडिया ने अपने लोगों की पीड़ा को ख़बरों में तरजीह नहीं दी। आखिर कौन सी मजबूरी है ? कौन सा डर है, जो पत्रकारों की पीड़ा बताने से रोक रहा है ?

ऊपर छंटनी के आंकड़े देने के पीछे मकसद यही है, कि किस तरह मीडिया छंटनी की खबरें लगातार दिखाता रहा है। मंदी ने पूरी दुनिया में लाखों लोगों को नौकरी से बाहर कर दिया। मीडिया ने छंटनी की इन ख़बरों को खूब दिखाया। पर जब अपने घर पर छंटनी के बादल मंडराए, तो हम बस देखते ही रहे। हमारे सामने ही ना जाने कितने पत्रकारों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। लेकिन किसी पत्रकार ने इसे एक कॉलम की ख़बर नहीं बनाया।

हम मंदी पर चर्चा करते रहे। आर्थिक मंदी के असर की हमने ढेर सारी बातें की। इसका क्या असर हो रहा है, इस पर भी खूब बातें हुई। लेकिन इन सारी चर्चाओं में नौकरी खो चुके पत्रकारों का ज़िक्र एकबार भी नहीं हुआ। बात ऐसी नहीं है कि मीडिया में छंटनी हो या फिर नहीं ? अगर मीडिया बाज़ार का हिस्सा है, तो ज़ाहिर है इसे बाज़ार के सिद्धांत ही चलाएंगे। तो फिर मीडिया की कंपनियां लोगों को चोरी छिपे क्यों निकाल रही हैं ? क्यों दूसरे क्षेत्रों की कंपनियों की तरह खुलेआम छटंनी की घोषणा नहीं की जाती ? क्या मीडिया से जुड़ी कंपनियां लोगों की छंटनी करने के बावजूद पाक साफ बने रहना चाहती हैं ?

पूरी दुनिया जानती है कि हद से ज़्यादा खुले बाज़ार ने दुनिया को एक ख़तरनाक आर्थिक परिस्थितियों की ओर धकेल दिया है। अमरीका से शुरू हुआ ये तूफान पूरी दुनिया में साइक्लोन की तरह घूम रहा है। अमरीका में साल 2008 में 26 लाख लोगों की नौकरी गई। ये आंकड़ा द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से अबतक तक का रिकॉर्ड है। आर्थिक मामलों के जानकार कह रहे हैं, कि साल २००९ मंदी का भयानक असर दिखाएगा।

अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का कहना है कि इस साल आर्थिक मंदी की वजह से दुनिया भर में पांच करोड़ लोगों को अपनी नौकरी गंवानी पड़ सकती है। ज़ाहिर है इससे एशियाई मुल्क भी नहीं बचेंगे। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के मुताबिक विश्व भर में छाए वित्तीय संकट के कारण साल 2009 में एशियाई देशों में लगभग २.3 करोड़ नौकरियां जा सकती हैं।

1 comment:

संगीता पुरी said...

बहुत बुरी स्थिति है ... आखिर दुनिया के इतने बेरोजगार लोग क्‍या करेंगे ?