Friday, January 10, 2014

सैफई में समाजवाद नाचा

दो हफ्ते के तमाशे के बाद यूपी का सैफई महोत्सव खत्म हो गया। समापन समारोह के लिए अखिलेश सरकार ने 50 सितारों को नाचने-गाने लिए बुलाया था। जिस राज्य के हजारों लोग दंगे के बाद बेघर हो गए उसका युवा मुख्यमंत्री बेफिक्र दिखाई दे रहा था। सैफई जश्न में जागता रहा और मुजफ्फरनगर राहत कैंप के लोग ठंड से ठिठुरते रहे।

सैफई में 300 करोड़ रुपए का नाच गाना और जश्न, 400 किलोमीटर दूर मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित कैंप में सन्नाटा। सैफई में सलमान के डांस पर खूब शोर मचा, दंगा पीड़ित कैंप में लोगों का दर्द रात के सन्नाटे में दिल चीर गया। सैफई में माधुरी के एक एक ठुमके पर तालियां बजी, कैंप की सर्द रात में ठिठुरते बच्चों की आवाज सुनाई दी। मल्लिका के डांस पर सीटियां बजी, दंगा पीड़ित कैंप से 34 माओं की टीस सुनाई दी, जिनके बच्चे सर्दी में कांप कांपकर मर गए। सैफई में जो हुआ उसे यूपी की अखिलेश सरकार ने बहुत गौर से देखा और मजे लेकर सुना। मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित कैंपों का सन्नाटा, दर्द, ठिठुरते बच्चों की आवाज, बच्चों को खोने वाली माओं की टीस हुक्मरानों को नहीं सुनाई दी। ये सब हुआ राम मनोहर लोहिया की शिष्य रहे समाजवादी मुलायम सिंह यादव के बेटे के राज में। सवाल तो होने ही थे, लोगों ने पूछा लोहिया के चेले के रहते ये कैसे हुआ? 

मुजफ्फरनगर के दंगा पीड़ित कैंप में बच्चे, बुजुर्ग और महिलायें ठंड में कांप रहे हैं। मुजफ्फरनगर से 400 किलोमीटर दूर अखिलेश- मुलायम का गांव जश्न मना रहा था। करोड़ों की लाइटिंग और करोड़ों के सितारों के बीच सैफई में यूपी सरकार ने गर्मी महसूस की, लेकिन दंगा पीड़ित कैंप के अंदर बच्चे सुबह के इंतजार में थे। वो रात भर गिनती गिनते रहे, ताकि सुबह सूरज निकले और वो धूप ताप सकें। समाजवाद का ऐसा नजारा तो यूपी ने पहली बार देखा।

यूपी की गरीब जनता ने आगरा की मुगलिया सल्तनत के ठाठबाट नही देखे होंगे। रामपुर के नवाबों को भी अरसा बीत गया, लेकिन 2014 में बेचारी जनता ने एक अलग राज देखा। यूपी के सीएम अखिलेश सैफई में राजा बन गए। तमाम मंत्री तो इर्द गिर्द फैले ही थे। अफसरों की फौज दासों की तरह पलक झपकने का इंतजार करती सी दिखी। जैसे राजा को कोई कष्ट हो, तो वो पलक पावड़े बिछा देंगे। 

मुज़फ्फनगर के कैंप में 4,783 दंगा पीड़ित अपना घरबार लुटा कर जैसे-तैसे गुजर बसर कर रहे हैं। 34 मासूम इसलिए मर गए, क्योंकि ठंड से बचने के इंतजाम नहीं थे। इसपर कुछ लाख रुपए खर्च होते तो मासूम बच जाते, लेकिन सरकार सैफई महोत्सव की रुपरेखा बनाने में लगी रही। जिसका प्लान तीन सौ करोड़ रुपए का था। मुलायम सिंह ताल ठोककर कहते हैं कि वो लोहिया के चेले हैं। पर ऐसी सीख तो लोहिया की नहीं थी। लोहिया की आत्मा सैफई का नाच और मुजफ्फरनगर का दर्द देखकर रोई ज़रूर होगी। 

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