हिमाल : अपना-पहाड़

बस एक कामना, हिम जैसा हो जाए मन

Wednesday, October 4, 2017

आंकड़ों की बाजीगरी - किसने सच बोला, कौन झूठ बोल रहा है?



देश के प्रधानमंत्री की बातों का मतलब होता है। इन बातों को पूरा देश गंभीरता से सुनता है। लेकिन इन दिनों प्रधानमंत्री जब जब भी बोले उनकी बातों ने यकीन की जगह सवाल पैदा किए। मैं सोच रहा हूं कि ऐसी क्या चीजें हैं। जो प्रधानमंत्री की बातों को सवालों के घेरे में खड़ी कर रही हैं। 

दरअसल मेरे मन में ये सवाल प्रधानमंत्री के अर्थव्यवस्था को लेकर कहे गए सबसे ताजा और विस्तृत बयान से पैदा हुए हैं। प्रधानमंत्री ने जिन तर्कों और आंकड़ों के साथ अपनी बातें रखी हैं। मैं इन्हें सच मानना चाहता हूं। मैं खुद से कहना चाहता हूं कि प्रधानमंत्री जी बिल्कुल सही बोल रहे हैं। और वैसे मैं सिर्फ प्रधानमंत्री जी की बातों को सुनूं तो इन्हें गलत कहने का कोई आधार मेरे पास नहीं है। लेकिन सिर्फ एक बात सुनकर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना समझदारी की बात नहीं है। चाहे ये बात किसी के मुंह से कही गयी हो।

प्रधानमंत्री बोले -  अर्थव्यवस्था के अच्छे दिन चल रहे हैं

तो सबसे पहले सबसे ताजा बात। दरअसल कल शाम प्रधानमंत्री ने दिल्ली स्थित विज्ञान भवन में देश के कंपनी सेक्रेटरी को संबोधित किया। मौका चाहे जो रहा हो। प्रधानमंत्री ने इस मौके का इस्तेमाल अपनी सरकार की आर्थिक नीतियों और गिरती अर्थव्यवस्था पर उठ रहे सवालों का जवाब देने के लिए किया। 

प्रधानमंत्री ने अपने लंबे भाषण में देश के आर्थिक हाल को लेकर लंबा व्याख्यान दिया। उन्होंने अर्थव्यवस्था के किसी इलाके को नहीं छोड़ा। मैन्यूफैक्चरिंग से लेकर सर्विस सेक्टर और एग्रीकल्चर सेक्टर तक के लिए प्रधानमंत्री ने आंकड़े पेश किए। प्रधानमंत्री ने हर आंकड़े के जरिए अर्थव्यवस्था की एक अच्छी तस्वीर पेश करने की कोशिश की। मसलन प्रधानमंत्री ने कहा 
    सौजन्य : हिंदुस्तान (5 अक्टूबर, 2017)
  • जून के बाद कमर्शियल वाहनों की बिक्री में 23 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है।
  • दोपहिया वाहनों में 14 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है।
  • ट्रैक्टरों की बिक्री में 34 फीसदी से ज्यादा का इजाफा हुआ है।
  • घरेलू एयर ट्रैफिक में 14 फीसदी बढ़ोतरी हुई।
  • हवाई जहाज के जरिए माल ढुलाई 16 फीसदी बढ़ गयी।
  • टेलीफोन, मोबाइल उपभोक्ताओं की संख्या 14 फीसदी बढ़ी।
  • और इसी के साथ प्रधानमंत्री ने जीएसटी और नोटबंदी को साहसिक फैसला बताया। और अपने लंबे भाषण में दोनों नीतियों के अर्थव्यवस्था और देश पर पड़ रहे अच्छे प्रभावों पर जोर देकर बात की।

रिजर्व बैंक को ये आंकड़े क्यों नहीं दिखते?

दरअसल मैं प्रधानमंत्री की ऊपर कही सारी बातों को सच मानने की कोशिश कर रहा हूं।
लेकिन अगर आप आर्थिक मामलों में रुचि रखते हैं, तो आप खुद से कुछ सवाल पूछेंगे। उनमें एक तो यही होगा कि जब प्रधानमंत्री ने देश के आर्थिक हालात पर विरोधियों के सवालों को खत्म करने के लिए शाम का वक्त चुना। तो उसी दिन 7 से 8 घंटे पहले देश के रिजर्व बैंक ने एक अलग ही बात कही। 

रिजर्व बैंक ने देश के आर्थिक हालात पर गहरी चिंता व्यक्त की। पहले ये समझना जरुरी है कि रिजर्व बैंक ने अर्थव्यवस्था को लेकर मुख्यतौर से क्या कहा?

    सौजन्य : The Times Of India (5 अक्टूबर, 2017)
 
रिजर्व बैंक ने मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के लिए विकास दर के अनुमान को आधे फीसदी से ज्यादा ‌यानी 0.60 फीसदी कम कर दिया। रिजर्व बैंक ने मार्च में खत्म हो रहे साल के लिए अपने अनुमान को 7.3 फीसदी से घटाकर 6.7 फीसदी कर दिया। ध्यान रखिए, ये सबकुछ प्रधानमंत्री के भाषण से कुछ घंटे पहले हुआ है। 
   सौजन्य : The Times Of India (5 अक्टूबर, 2017)

रिजर्व बैंक की मॉनीटरी पॉलिसी कमेटी ने एक और बड़ी बात कही। MPC ने कहा कि जीएसटी के लागू होने का मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर काफी बुरा असर पड़ा है। आगे कहा कि इससे निवेश में सुधार की उम्मीदों में बाधा आ सकती है। 

रिजर्व बैंक ने अपने कुछ निगेटिव अनुमानों की वजह से ब्याज दरों में कटौती को मुनासिब नहीं समझा। जबकि सरकार लगातार कोशिश में थी कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों मे कमी लाए। इसे लेकर मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमनियन ने पैरवी भी की।

कोई तो है, जो आंकड़ों में उलझा रहा है

सवाल देश की दो बड़ी संस्थाओं की तरफ से अर्थव्यवस्था को लेकर अलग अलग तरह के दावों से उठ रहे हैं। प्रधानमंत्री जी ने अर्थव्यवस्था के ज्यादातर आंकड़ों को बेहतर बताया। लेकिन रिजर्व बैंक विकास दर के अनुमान को कम पेश कर रहा है। 

प्रधानमंत्री अर्थव्यवस्था के अच्छे दिनों की उम्मीद कर रहे हैं। रिजर्व बैंक को सरकार द्वारा लागू फ्लैगशिप नीतियों (जीएसटी और नोटबंदी) से अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले नकारात्मक असरों की चिंता सता रही है। 
प्रधानमंत्री कमर्शियल वाहनों, दोपहिया वाहनों और सर्विस सेक्टर के कुछ क्षेत्रों के बेहतरीन आंकड़े गिना रहे हैं। तो रिजर्व बैंक कह रहा है कि मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर पर जीएसटी का काफी बुरा असर पड़ रहा है और इससे निवेश बाधित होगा। 

                            सौजन्य : हिंदुस्तान (5 अक्टूबर, 2017)

हम किसकी बात पर भरोसा करें?

एक आम आदमी को किसकी बात पर भरोसा करना चाहिए? प्रधानमंत्री की या फिर रिजर्व बैंक की। ऐसे रिजर्व बैंक की बातों पर क्यों न भरोसा करें, जिसके गवर्नर को प्रधानमंत्री के नेतृत्व में इसी सरकार ने नियुक्त किया है। ज्यादातर डिप्टी गवर्नर भी इसी सरकार ने नियुक्त किए हैं। और ये लोग आर्थिक मामलों के माहिर हैं। 

इसी वक्त हम प्रधानमंत्री और उनके सलाहकारों की बातों पर भी शक कैसे करें? हालांकि ये बात तो माननी पड़ेगी कि रिजर्व बैंक जब आंकड़े पेश करता है, तो उसे राजनीति नहीं करनी होती। इसके उलट प्रधानमंत्री एक राजनीतिक पार्टी के नेता हैं, और उन्हें आने वाले दिनों में चुनाव भी जीतने हैं। तो वो जो बात कहें, उसमें राजनीतिक नफा नुकसान का ध्यान तो रखा ही गया होगा।

CSO गलत या रिजर्व बैंक ‌या फिर प्रधानमंत्री जी?

सवाल इससे आगे भी हैं। अगर प्रधानमंत्री की बातें सही हैं। तो फिर सरकार की संस्था CSO ने जीडीपी के खराब आंकड़े क्यों पेश किए? लगातार छह तिमाही से जीडीपी की दर ढलान पर क्यों है? क्या जो आंकड़े प्रधानमंत्री जी के पास हैं वो CSO के पास नहीं। या फिर जिन आंकड़ों की बातें प्रधानमंत्री कर रहे हैं, उनका जीडीपी के जोड़ घटाव से कोई लेना देना नहीं है। सवाल बनता है।
और फिर अगर प्रधानमंत्री जी के पास इतने बेहतरीन आंकड़ें हैं। तो इसे रिजर्व बैंक के लोगों ने कैसे नजरअंदाज किया? क्यों रिजर्व बैंक ने जीडीपी के अनुमान को कम किया? क्यों जीएसटी के अर्थव्यवस्था के एक बड़े सेक्टर पर खराब असर की बात कही? हमें इन सवालों के बारे में गंभीरता से सोचना चाहिए। 

तो कोई तो है, जो देश से झूठ बोल रहा है। देश को आंकड़ों की बाजीगरी में उलझा रहा है।
क्या ऐसा करने के लिए सरकार रिजर्व बैंक के कान पकड़ेगी? या सब चुप रहेंगे?


0 Comments:

Post a Comment

Subscribe to Post Comments [Atom]

<< Home