हिमाल : अपना-पहाड़

बस एक कामना, हिम जैसा हो जाए मन

Saturday, April 18, 2009

सुनो, मैं नैनीताल बोल रहा हूं-2

इक शहर की आत्म-कथा

(इसके पहले हिस्से में हमने नैनीताल शहर के जन्म और फिर यहां अंग्रेज़ों के आगमन की कहानी सुनी। हमने सुना कि कैसे एक शहर कई बार प्रकृति के झंझावातों से जूझा। टूटा, बिखरा और फिर से खड़ा हुआ और बस गया। फिर आगे ये भी सुना कि कैसे अंग्रेज़ों को चारों ओर से घिरे पहाड़ी शहर ने आकर्षित किया। और किस तरह अंग्रेज अधिकारियों ने अपने लिया यहां कोठियों का निर्माण कराया। बात ये भी हुई कि किस तरह से नैनीताल देश की सबसे पुरानी नगरपालिका में से एक है, और इसकी आय कैसे दिन-ब-दिन बढ़ती गयी।......... अब आगे)

तो नैनीताल नगरपालिका की कमाई १९३२ तक आते-आते पचास हज़ार रुपए को पार कर गयी। ये वक्त देश में अंग्रेज़ों के प्रचार प्रसार का था। धीरे-धीरे अंग्रेजों का प्रसार कुमांऊ में बढ़ता रहा। कुमांऊ तत्कालीन युनाइटेड प्रोविंस का सबसे उत्तरी छोर था। जिसे आज हम उत्तराखंड राज्य के नाम से जानते हैं, उसका एक अहम हिस्सा। एक हिस्सा गढ़वाल कहलाता है और दूसरा कुमाऊं। जब अंग्रेजों का कुमांऊ में प्रसार बढ़ता गया, तो इसने नयी प्रशासनिक आवश्यकताओं को बढ़ाया। अब अंग्रेज और भारतीय कर्मचारियों की संख्या बढ़ने लगी। और धीरे-धीरे स्कूल, अस्पताल, चर्च.... और रहने के लिए मकानों की संख्या भी बढ़ने लगी । धीरे-धीरे मैं, जो अबतक सुनसान जंगलों में रहने का आदि था, भीड़ और शोरगुल का अभ्यस्त हो गया।

१८८० में ज़ोरदार भू-स्खलन हुआ, जिसमें पहला असेंबली भवन दब गया। तब दूसरा असेंबली भवन १८८१ में बनाया गया। लेकिन ३९ साल बाद ये भी एक भीषण आग में जल गया। बाद में वर्तमान असेंबली भवन १९३२ में एक लाख ८८ हज़ार रुपए की लागत से बनाया गया।

सबसे पहला स्कूल १८५० में इसाई मिशनरियों ने खोला। फिर तो कई स्कूल बनने लगे। १८५० में पहला स्कूल मिशन स्कूल के नाम से खोला गया था। १९०४ में इसका नाम इम्फ्री हाईस्कूल रख दिया गया। १९२५ में इस स्कूल को सरकार ने खरीद लिया। १९२८ में शहर के जानेमाने शख्स लाला चेतराम साह ठुलघरिया ने इस स्कूल को पचास हज़ार रुपए का दान दिया, और इस प्रकार अक्टूबर १९२८ में इसका नाम चेतराम हाईस्कूल हो गया।

अंग्रेजों ने लत्लीताल और मल्लीताल को जोड़ने के लिए झील के दोनों ओर एक बटिया बना ली। एक को मालरोड और दूसरी ठंडी सड़क कहा जाने लगा। पहले ये दोनों सड़कें पैदल चलने के लिहाज़ से बनाई गयी। लेकिन अंग्रेज़ों ने अपनी सुविधा के लिए इसे चौड़ा कराया, और फिर इसे मोटर गाड़ी चलाने लायक कर दिया गया। रात में लोगों को आने-जाने की दिक्कत ना हो इसके लिए रात के वक्त सड़क के दोनों ओर कैरोसिन लैंप लगाए गए। १९१९ में सड़क के दोनों ओर बिजली के माध्यम से रोशनी की व्यवस्था का काम शुरू हुआ। ४ सितंबर १९२२ को शहर के तमाम बड़े घरों में बिजली पहुंच गयी। अब मालरोड पर भी बिजली की रोशनी होने लगी।

आज भी ये दोनों सड़के नैनीताल में आवागमन का माध्यम हैं। लोग शाम होते ही माल रोड की सैर करने निकल पड़ते हैं... आज भी शहर के लोगों के लिए मिलने जुलने का बड़ा माध्यम है मालरोड। लोग के लिए मीटिंग प्लेस। जिन्हें खामोशी पसंद है... और जो मेरे किनारे बैठकर खुद से बातें करना पसंद करते हैं, वो दूसरी ओर बनी ठंडी सड़क की ओर चले जाते हैं, गर्मियों में ठंडी सड़क में घूमना काफी अच्छा लगता है।

(मेरी कहानी का पहला हिस्सा पढ़ने का मन करे, तो 'इक शहर की आत्मकथा' लेबल पर क्लिक कर, पहले हिस्से में पहुंच सकते हैं।)

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