Sunday, April 5, 2009

अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें

मौसम चुनाव का है, और हर तरफ चुनावी हवा बह रही है। ऐसे में बहुत से ऐसे लोग भी होंगे, जिनकी देशभक्ति उछाल मार रही होगी। लेकिन देशभक्ति और नेतागिरी में कोई वास्ता होता भी है या नहीं एक बड़ा सवाल है ? राजनीति का इतिहास मानव सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है। एस व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर शासन करता है, ये कबिलाई युग में हुआ करता था। जब इंसान घुम्मकड़ था, तो भी कुछ लोग थे, जो शासक थे.... वो शासन करते थे.... अपने ही जैसी योग्यता वाले दूसरे लोगों पर। तभी से शासक और प्रजा का रिश्ता चला आ रहा है। यानि राज-नीति और देश-नीति दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। तो क्या देशभक्ति की चाह रखने वालों के लिए राजनीति काम की चीज़ नहीं है ? .... इसका जवाब हां भी हो सकता है, और नहीं भी।............. सवाल ये है कि क्या देश के लिए काम करने की इच्छा रखने वाले लोग नेता बनने के लिए वो सब कर सकेंगे, जो आज की राजनीति में ज़रुरी बन गया है ?

भारत जैसे लोकतंत्र में, जिसे दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र कहा जाता है.... राजनीति करना क्या आसान बात है ? लोगों के लिए होता है, लोकतंत्र.... पर क्या सही मायनों में भारत में आम लोगों के लिए लोकतंत्र है ? या फिर लोकतंत्र चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है ? क्या आम आदमी इस लोकतंत्र में चुनाव जीतकर संसद या विधानसभा में पहुंचने की बात सोच सकता है ? इस सवाल का जवाब सब जानते हैं। अगर आम आदमी चुनाव में खड़े होने की बात सोच भी ले तो उसके जीतने की संभावना है ही कहां ?
दरअसल चुनाव लड़ने के लिए दो-तीन बातें मुख्य योग्यता के रुप में सामने आती हैं।
पहली योग्यता, क्या आप किसी राजनेता के पुत्र, पुत्री या रिश्तेदार हैं ? क्या आपका किसी राजनैतिक खानदान से संबंध है ? या फिर आप किसी राजनेता से करीब का संबंध रखते हैं ? अगर आप इनमें से किसी से भी संबंध नहीं रखते, तो भूल जाइए राजनीति की ओर जाने का ख्वाब।
दूसरी योग्यता, क्या आप अमीर हैं, आपके पास चुनाव में खर्च करने लायक ढेर सारा पैसा है ? इससे भी अधिक... क्या आप राजनीतिक दलों को चढावा चढाकर टिकट पाने की कुव्वत रखते हैं ? अगर आप ये कर सकते हैं, तो फिर आपके लिए राजनीति करने के अवसर हैं। लेकिन अगर आप पैसे का जुगाड़ नहीं कर सकते तो फिर राजनीति आप के लिए नहीं है।
तीसरी योग्यता, ये बड़ा ही दिलचस्प है। लेकिन ये राजनीति में पहुंचने का एक आसान रास्ता है। ना आपको किसी विश्वविद्यालय की डिग्री की ज़रुरत है। और ना ही आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक मामलों की समझ की। करना सिर्फ इतना है... क़त्ल या मारपीट, डकैती, चोरी या लूटपाट, आगजनी या तोड़फोड़, ब्लात्कार, भ्रस्टाचार या ऐसी ही कोई दूसरी वारदात।..... ऐसा कोई काम जो नैतिक शिक्षा की किताब में कहीं ना लिखा हो। .... आपको नैतिक शिक्षा का विरोध करना है। अगर आप ये सब कर सकते हैं, और इलाके में अपने नाम का खौफ पैदा कर सकते हैं... तो राजनीति में आपका स्वागत है।

एक आम हिंदुस्तानी जो समाज के लिए कुछ कर गुजरने की बात सोचता है। वो कुछ भी कर सकता है, लेकिन राजनीति के कीचड़ में उतरकर चुनाव नहीं जीत सकता। तो क्या हमारी नियति यही है ? कि हम वैसे ही नेताओं को चुनाव जिताते रहें, जो पांच साल बाद फिर से हमारे दरवाज़े पर अपने वादों की पोटली खोलकर हमसे हमारा सबसे बड़ा अधिकार मांगेंगे। वो कहेंगे कि इसबार वो सब कुछ बदल देंगे। वो कहेंगे कि बस एकबार उन्हें वोट दीजिए, और फिर देखिए हम क्या करते हैं ?
कोई मंदिर के नाम पर बांटेगा। कोई मस्जिद के नाम पर बांटेगा। कोई गरीबी के नाम पर वोट मांगेगा और कोई रोजगार के नाम पर। पर क्या वास्ताव में पांच साल बाद ये समस्या ख़त्म होगी ?
चुनाव तो हमें करना ही चाहिए। वोट भी ज़रुर देना चाहिए। पर किसे ? अगर हर तरफ एक से चेहरे नज़र आ रहे हों, तो ज़ाहिर है... चुनने में मुश्किल होगी। पर फिर भी समाज बांटकर राजनीति करने वालों से तो बचना ही होगा।
इस बार एकबार फिर से मौका है... चुनाव करने का। हम किसे चुनते हैं, इसी पर हमारी भविष्य निर्भर करेगा। एकबार मौका गवांया तो फिर पांच साल इंतज़ार करना होगा। तो समझदारी इसी में है.... अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें।

1 comment:

संगीता पुरी said...

समझदारी इसी में है.... अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें ... और अच्‍छा सच्‍चा न हो तो ?