हिमाल : अपना-पहाड़

बस एक कामना, हिम जैसा हो जाए मन

Saturday, September 19, 2009

कलावती को देखा है ?


तो कलावती भी चुनाव लड़ेगी। आप कहेंगे, कौन .... कलावती भाई?
तो जवाब है... वो कलावती, जिसकी अपनी कोई पहचान नहीं है। लेकिन आप इस कलावती को घर से बाहर आते-जाते कहीं भी पहचान सकते हैं। ये कलावती देश के उन करोड़ों भूखे लोगों में से ही एक है, जो एक वक्त भरपेट खाने के लिए तरसती आंखों से दूसरे के खाने को देखती हैं। वो कलावती जिसका पति ७-८-९-१० बच्चे पैदा करने के बाद एक दिन इसलिए फांसी लगाकर मर जाता है, कि वो साहूकार का कर्ज़ नहीं चुका सकता। ये कलावती उन करोड़ों में से एक है, जो गोल-गोल रोटी के अलावा कोई दूसरा सपना नहीं देखती।

लेकिन गरीबी, लाचारी और मुफलिसी के बाद भी सपने हैं कि आंखों में तैर ही जाते हैं। तो कलावती जिसके लिए एक वक्त की रोटी भी मुश्किल है, चुनाव लड़ेगी। सवाल ये है कि ये सपने मुफलिसी में जागे कैसे? आखिर वो कौन सी बात है.... जो मुफलिसी में भी पलती है... और आगे बढ़ती है। दरअसल कलावती वो औरत है, जिसने मुफलिसी के उस तिम छोर को देख लिया है, जहां से नीचे कुछ नहीं।... नौ बच्चे और कलावती। जहां उसके पति ने हिम्मत हारी थी, वहीं से कलावती को आगे बढ़ना था..... नौ बच्चों के साथ। कलावती भी खा सकती थी सल्फास की एक गोली, शायद ये उस जैसे मुफलिसी में आसान रास्ता होता, लेकिन कलावती ने मुश्किल रास्ता चुना। कलावती को मरना मंजूर नहीं था। उसे जीना था।
वैसे बात कलावती की पहचान की हो रही थी। तो कलावती की एक पहचान भी है। कलावती वो महिला है, जिसकी झोपड़ी पर कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी एक बार गए थे। जैसे गरीब की कुटिया पर भगवान पधारे थे। कांग्रेस के युवराज के जिस जगह कदम पड़ें, वहां दूसरे नेता ना जाएं। ऐसा भला कैसे हो सकता है ? नेता भी गए, और पीछे-पीछे कैमरे भी। और कलावती अखबारों में छपने लगी। इससे भी अधिक टीवी चैनलों ने रातों-रात कलावती के ज़रिए भारत की सुदूर गांव की गरीबी को उभार कर रख दिया।
इसका कितना फायदा कलावती या उसके गांव के दूसरे लोगों को हुआ पता नहीं। लेकिन कलावती को इसने आम से कुछ खास ज़रुर बना दिया। हालांकि दिक्कतें उतनी ही हैं अभी भी। कलावती विदर्भ के उन हज़ारों किसानों की विधवाओं का प्रतीक बन गई है। जिन्होने सूखे... और फिर साहूकारों के जाल में फांसी का फंदा लगा लिया... या फिर ज़हर खाकर अपनी जान दे दी।
कलावती चुनाव लड़ेगी। लेकिन उसे कांग्रेस टिकट नहीं दे रही। वो गरीब है, उसके पास तो नामांकन के लिए भी पैसे नहीं होंगे। और उसके अमीर प्रत्याशियों के सामने जीतने की कितनी उम्मीद है ? बीजेपी या शिवसेना भी उसे टिकट नहीं देगी, क्योंकि उन्हें कलावती में जीत की कोई उम्मीद नज़र नहीं आती।
सब जानते हैं, कि कलावती का चुनाव लड़ना क्या है? जहां केवल हार-जीत के मायने हों। वहां कोशिश का मतलब भी क्या है? लेकिन विदर्भ के किसानों की मुश्किलों और उनके खराब हालातों के लिए आवाज़ उठा रहे लोगों के लिए इसके मायने हो सकते हैं। और उन तमाम हज़ारों लोगों के लिए तो और भी अधिक जिन्होने सूखे और साहूकारों के जाल में अपनों को खो दिया।
हालांकि एक बड़ा सवाल फिर भी बाकी है, कि वणी क्षेत्र के लोग मतदान के दिन पचास रुपए के नोट से अपने वोट को बेच तो नहीं देंगे? ( वणी वही जगह है, जहां से कलावती विदर्भ जनसंघर्ष समिति के समर्थन से चुनाव लड़ने की बात कह रही है).... कहीं मतदान के दिन भूखे लोगों की भूख इस क़दर तो नहीं बढ़ जाएगी, कि उसको सहन कर पाना मुश्किल हो जाएगा? और फिर १० रुपए का एक नोट और घर भर के लिए खाना वोट के लिए काफी है। ज़ाहिर है, कुछ लोग इस फिराक में तो होंगे ही, कि कैसे भूखे लोगों के वोट को दो रोटी से खरीद लिया जाए।
अगर अपने ही हालातों से जूझती, लड़ती कलावती हारी तो ये तय हो जाएगा, कि वणी के लोग और कुछ सालों के लिए वैसे ही हालातों में जीने को अभिशप्त हैं।

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Wednesday, April 8, 2009

एक गाली देने में क्या जाता है ?

वोट पाने के लिए
आसान रास्ता लगा उन्हें (?)
हिंदू को अपने पाले में कर लो
मुसलमान को एक गाली देकर
कितना आसान काम है
एक गाली देने में क्या जाता है ?
कितना वक्त लगता है ?

पर एक गाली की टीस
कई दिनों तक सहता है
आम आदमी
वो आम..... जिसे रोज खाना
रोज कमाना होता है ।।

और उनका क्या ?
जो गाली और इसके बाद एक गाली के बीच
लड़-लड़कर अपना खून बहा रहे हैं
इसबार जीत भी जाएंगे वो (?)
पर हार जाएगा... (?) भाईचारा
लोगों के बीच सालों से पनपा अमन ।

वो जीतकर संसद पहुंचेंगे
हो सकता है ? नेताजी मंत्री बन जाए
पर लोगों का क्या होगा ?
लोग कहां जाएंगे ?
जो टूट गए रिश्ते
क्या वो फिर से पनपेंगे ?
क्या इन टूटे रिश्तों पर प्यार के फूल खिल पाएंगे ?

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धर्म सत्ता या 1000 साल पीछे की ओर...

राजनीति में पहले तलवारें चलती थी। ख़ून से राजतिलक हुआ करता था। फिर वक्त बदला... लेकिन राजनीति में दगाबाज़ी ज़रा भी कम नहीं हुई है। मौकापरस्ती, कुर्सी हथियाने के हथकंडे वैसे ही पहले की तरह कायम हैं। हथियार बदल गए हैं, पर लड़ाई का मैदान अभी भी वही है... और सबसे बड़ी बात लड़ाई अभी भी एक ही बात की है। सत्ता पर कौन काबिज़ होगा ?

चुनाव का चक्रव्यूह सजा हो, तो राजनीति का असली चेहरा नज़र आता है। बस तलवारें नहीं चल रही हैं, ख़ून के छींटे नज़र नहीं आ रहे हैं।.... लेकिन तलवार की जगह ज़ुबानी जंग कम नहीं। नेता बस बयान देते हैं, उनके समर्थक इस बयान की ऊर्जा से एक दूसरे पर टूट पड़ते हैं। बिना सोचे कि क्या उनके नेता ने सही कहा ? समर्थक कभी नहीं सोचता कि सही और गलत क्या है ? नेता की अंधभक्ति ही कहेंगे इसे.... नेता के इशारे पर दंगों के लिए निकल पड़ते हैं... ये समर्थक।

लड़ाई इस बात की है, कि हिंदू के वोट पर कब्ज़ा कौन करेगा ? लड़ाई मुस्लिम वोटरों को हथियाने की भी कम नहीं है। सिख वोटरों के भी कुछ खरीदार हैं, वो जानते हैं कि सिख वोटरों को किस तरह अपने पाले में किया जा सकता है। फिर कुछ ऐसे लोग भी बच जाते हैं... जो ये देखकर कि हिंदू, मुस्लिम और सिख राजनीतिक रुप से लामबंद हो रहे हैं, अपने लिए एक झंडे की तलाश करने के लिए निकल पड़ते हैं।.... तो कुल मिलाकर राजनीति की बदौलत एक समाज टुकड़ों में विभाजित हो रहा है।

ये तो धर्म के आधार पर हो रही राजनीति की बात है। जिसने एक देश को चार बड़े हिस्सों में तब्दील कर दिया है। लेकिन सत्ता और कुर्सी की चाहत देश के चार टुकड़ों से खुश नहीं है। इन्हें देश को कुछ और खांचों में बांटना है। तो फिर बिहार में हिंदू वोटर को कैसे बांटा जाए ? यादव को कैसे अपने पाले में किया जाए ? पासवान... कुर्मी... दलित.... भूमिहार, राजपूत और ब्राह्मण वोटरों पर भी नेताओं की नज़र है। लोग नेताओं की मोटी चमड़ी को जानते हैं.... लेकिन इसके खिलाफ नहीं जाते। नेता धर्म से निकलकर जाति के टुकड़ों में समाज को बांट रहे हैं। और समझदार जनता तात्कालिक बहकावे में आकर बंटवारे को स्वीकार कर लेते हैं।

इसपर भी राजनीतिक दलों को इस बात से परहेज नहीं की वो क्या कर रहे हैं ? हिंदू झंडा उठाकर अखिल भारतीय राजनीति करने वालों की भी कमी नहीं। पर सवाल ये है कि क्या हिंदू झंडे को उठाकर अखिल भारतीय राजनीति की जा सकती है ? क्या कोई दल भारत में हिंदुओं की बात कर राजनीति रुप से स्वीकार्य हो सकता है ? ज़ाहिर है जब कोई हिंदूवाद की राजनीति करेगा, तो मुस्लिम राजनीति करने के लिए स्वत: ही रास्ता बन जाएगा। और फिर शुरू होगी कभी ना ख़त्म होने वाली प्रतिक्रिया। शायद यही हमारे दौर की सबसे मुश्किल परेशानी है।

अफगानिस्तान, पाकिस्तान, ईरान, इराक में क्या चल रहा है ? ये धार्मिक राजनीति का ही परिणाम है। कभी कहा गया था कि धर्म अफीम की तरह काम करता है। काफी हद तक ये बात दक्षिण एशिया के एक बड़े हिस्से पर सही बैठ रही है। तालिबान जिस राजनीति को आगे बढ़ा रहा है.... उसके मूल में धर्म है, हालांकि तालिबान का धर्म ..... इस्लाम के मूल सिद्धांतों के कितना करीब है ? इस पर अलग से बहस होनी चाहिए। लेकिन वो जैसा भी हो, तालिबान तो इस्लाम का इस्तेमाल कर ही रहा है।

दुनिया एक मुश्किल दौर से गुजर रही है। हमारे पड़ोस में धार्मिक राज्य की सत्ता अपना प्रभाव बढ़ा रही है। यानि हमारा पड़ोस एक हज़ार साल पुराने योरोप की ओर बढ़ रहा है। जहां धर्म की सत्ता मज़बूत थी। एक ऐसा धर्म सत्ता जिसे तोड़ने के लिए योरोप को तीन सौ साल लग गए। और फिर शुरू हुआ आधुनिक योरोप बनने का सिलसिला। धार्मिक सत्ता का पराभव योरोप के विकास का पहला पत्थर था।

लेकिन इंसान इतिहास से सबक नहीं लेता। हमारा पड़ोस उसी इतिहास की ओर बढ़ रहा है। सोचिए भारत की एक लंबी सीमा रेखा पर एक मज़बूत धर्म केंद्रित राज्य....... पाकिस्तान में तालिबान शक्तियां मज़बूत हो रही है.... अफगानिस्तान के हालात पहले से ही बदतर हैं..... बचा बांग्लादेश तो वहां भी कठमुल्ला तालिबान के हाथ का खिलौना बनने को तैयार बैठे हैं। जाहिर है.... भारत के लिए ख़तरा सबसे अधिक है। और इससे लड़ने के हमारे पास अधिक साधन नहीं हैं।

कहते हैं अगर बाहर हवा में रोग के कीटाणु अधिक हों तो हमें हमारी भीतरी ताकत ही रोग से बचा सकती है। यानि प्रतिरोधक क्षमता की मज़बूती ज़रुरी है। प्रतिरोधक क्षमता का मतलब परमाणु हथियार से लैस होना है क्या ? या फिर सेना में लाखों सैनिक होना ? या फिर वायु सेना की मज़बूती ?.... इन सबकी मज़बूती से इनकार नहीं किया जा सकता, पर यही देश को बाहरी हमले से बचा पाएंगे कहना ठीक नहीं होगा।.... असल शक्ति देश की जनता है। देश का हर नागरिक, वो हिंदू है... वो मुस्लिम है... सिख और ईसाई है।.... हर नागरिक बिना किसी भेदभाव के। .... अगर हर नागरिक को ये अहसास रहे कि केंद्र और राज्य में बैठी सरकार उसके साथ भेद नहीं करेगी। उसे भरोसा हो कि हर कीमत पर कानून उसके अधिकारों की रक्षा करेगा। उसे भरोसा रहे कि स्कूल, कॉलेज और नौकरी में उसके साथ धर्म आधारित भेद नहीं होगा।................ तो शायद बाहर से हमला करने वाले कामयाब नहीं हो पाएंगे।

लेकिन हो क्या रहा है ? गेरुआ झंडा उठाकर राजनीति करने वाले हिंदू हितों की बात करते हैं। लोग कहेंगे वो मुसलमानों का विरोध नहीं करते। लेकिन हिंदू हितों की बातें करते हुए वो मुस्लिम हितों का विरोध कर ही देते हैं।..... तो अगर ये सरकार केंद्र या राज्य में बैठी तो एक बड़े समुदाय को सरकार पर भरोसा कैसे होगा ?

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Sunday, April 5, 2009

अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें

मौसम चुनाव का है, और हर तरफ चुनावी हवा बह रही है। ऐसे में बहुत से ऐसे लोग भी होंगे, जिनकी देशभक्ति उछाल मार रही होगी। लेकिन देशभक्ति और नेतागिरी में कोई वास्ता होता भी है या नहीं एक बड़ा सवाल है ? राजनीति का इतिहास मानव सभ्यता के इतिहास जितना ही पुराना है। एस व्यक्ति दूसरे व्यक्ति पर शासन करता है, ये कबिलाई युग में हुआ करता था। जब इंसान घुम्मकड़ था, तो भी कुछ लोग थे, जो शासक थे.... वो शासन करते थे.... अपने ही जैसी योग्यता वाले दूसरे लोगों पर। तभी से शासक और प्रजा का रिश्ता चला आ रहा है। यानि राज-नीति और देश-नीति दोनों अलग-अलग चीज़ें हैं। तो क्या देशभक्ति की चाह रखने वालों के लिए राजनीति काम की चीज़ नहीं है ? .... इसका जवाब हां भी हो सकता है, और नहीं भी।............. सवाल ये है कि क्या देश के लिए काम करने की इच्छा रखने वाले लोग नेता बनने के लिए वो सब कर सकेंगे, जो आज की राजनीति में ज़रुरी बन गया है ?

भारत जैसे लोकतंत्र में, जिसे दुनिया का सबसे विशाल लोकतंत्र कहा जाता है.... राजनीति करना क्या आसान बात है ? लोगों के लिए होता है, लोकतंत्र.... पर क्या सही मायनों में भारत में आम लोगों के लिए लोकतंत्र है ? या फिर लोकतंत्र चंद लोगों के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है ? क्या आम आदमी इस लोकतंत्र में चुनाव जीतकर संसद या विधानसभा में पहुंचने की बात सोच सकता है ? इस सवाल का जवाब सब जानते हैं। अगर आम आदमी चुनाव में खड़े होने की बात सोच भी ले तो उसके जीतने की संभावना है ही कहां ?
दरअसल चुनाव लड़ने के लिए दो-तीन बातें मुख्य योग्यता के रुप में सामने आती हैं।
पहली योग्यता, क्या आप किसी राजनेता के पुत्र, पुत्री या रिश्तेदार हैं ? क्या आपका किसी राजनैतिक खानदान से संबंध है ? या फिर आप किसी राजनेता से करीब का संबंध रखते हैं ? अगर आप इनमें से किसी से भी संबंध नहीं रखते, तो भूल जाइए राजनीति की ओर जाने का ख्वाब।
दूसरी योग्यता, क्या आप अमीर हैं, आपके पास चुनाव में खर्च करने लायक ढेर सारा पैसा है ? इससे भी अधिक... क्या आप राजनीतिक दलों को चढावा चढाकर टिकट पाने की कुव्वत रखते हैं ? अगर आप ये कर सकते हैं, तो फिर आपके लिए राजनीति करने के अवसर हैं। लेकिन अगर आप पैसे का जुगाड़ नहीं कर सकते तो फिर राजनीति आप के लिए नहीं है।
तीसरी योग्यता, ये बड़ा ही दिलचस्प है। लेकिन ये राजनीति में पहुंचने का एक आसान रास्ता है। ना आपको किसी विश्वविद्यालय की डिग्री की ज़रुरत है। और ना ही आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक मामलों की समझ की। करना सिर्फ इतना है... क़त्ल या मारपीट, डकैती, चोरी या लूटपाट, आगजनी या तोड़फोड़, ब्लात्कार, भ्रस्टाचार या ऐसी ही कोई दूसरी वारदात।..... ऐसा कोई काम जो नैतिक शिक्षा की किताब में कहीं ना लिखा हो। .... आपको नैतिक शिक्षा का विरोध करना है। अगर आप ये सब कर सकते हैं, और इलाके में अपने नाम का खौफ पैदा कर सकते हैं... तो राजनीति में आपका स्वागत है।

एक आम हिंदुस्तानी जो समाज के लिए कुछ कर गुजरने की बात सोचता है। वो कुछ भी कर सकता है, लेकिन राजनीति के कीचड़ में उतरकर चुनाव नहीं जीत सकता। तो क्या हमारी नियति यही है ? कि हम वैसे ही नेताओं को चुनाव जिताते रहें, जो पांच साल बाद फिर से हमारे दरवाज़े पर अपने वादों की पोटली खोलकर हमसे हमारा सबसे बड़ा अधिकार मांगेंगे। वो कहेंगे कि इसबार वो सब कुछ बदल देंगे। वो कहेंगे कि बस एकबार उन्हें वोट दीजिए, और फिर देखिए हम क्या करते हैं ?
कोई मंदिर के नाम पर बांटेगा। कोई मस्जिद के नाम पर बांटेगा। कोई गरीबी के नाम पर वोट मांगेगा और कोई रोजगार के नाम पर। पर क्या वास्ताव में पांच साल बाद ये समस्या ख़त्म होगी ?
चुनाव तो हमें करना ही चाहिए। वोट भी ज़रुर देना चाहिए। पर किसे ? अगर हर तरफ एक से चेहरे नज़र आ रहे हों, तो ज़ाहिर है... चुनने में मुश्किल होगी। पर फिर भी समाज बांटकर राजनीति करने वालों से तो बचना ही होगा।
इस बार एकबार फिर से मौका है... चुनाव करने का। हम किसे चुनते हैं, इसी पर हमारी भविष्य निर्भर करेगा। एकबार मौका गवांया तो फिर पांच साल इंतज़ार करना होगा। तो समझदारी इसी में है.... अच्छे को चुनें, सच्चे को चुनें।

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Tuesday, March 31, 2009

अब हमारी बारी है

तो एकबार फिर से सिद्ध हो गया कि देश में कुछ संस्थाएं हैं, जो अपना काम बखूबी कर रही हैं। सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने भले ही अभिनेता से नेतागिरी के मैदान में उतरे संजय दत्त का दिल तोड़ दिया हो। लेकिन देश के बहुत से लोग खुश होंगे, आखिर एक सज़ायाफ्ता मुज़रिम के साथ जो होना चाहिए था... वही हुआ। एक ऐसा शख्स जिसने मुंबई धमाकों के वक्त अपने पास ऐसे हथियार रखे, जो सामान्य नहीं थे। देश की कौन सी अदालत कहेगी सही था ? जैसा कि साफ था, कोर्ट ने संजय दत्त को दोषी माना और उन्हें आर्म्स एक्ट के तहत 6 साल की सजा सुनाई। संजय दत्त फिलहाल जमानत पर जेल से बाहर हैं।
देश की सर्वोच्च अदालत ने कहा कि संजय दत्त चुनाव नहीं लड़ सकते। सुप्रीम कोर्ट ने संजय दत्त की चुनाव लड़ने की इजाज़त मांगने के लिए दायर याचिका खारिज कर दी। याचिका में संजय दत्त ने मुंबई ब्लास्ट मामले में दोषी ठहराए जाने का फैसला सस्पेंड करने की मांग की थी, ताकि वह लोकसभा चुनाव लड़ सकें।
चीफ जस्टिस केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली बेंच ने संजय दत्त के वकील और याचिका का विरोध कर रही सीबीआई की दलीलों को सुनने के बाद अपना फैसला सुनाया। न्यायाधीशों ने कहा कि किसी व्यक्ति को चुनाव लड़ने की इजाजत देने के लिए उसकी सजा को निलंबित करने के कोर्ट के अधिकार का इस्तेमाल दुर्लभ मामलों में ही किया जाता है। कानून के जानकार सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेहद अहम बता रहे हैं। लेकिन इस फैसले ने उन तमाम अपराधियों की नींद उड़ा दी है, जो जेल से नेता बनने का ख्वाब देख रहे थे।
अब इस विरोधाभाष को देखिए संजय दत्त को टाडा कोर्ट ने सज़ा सुनाई। उस कोर्ट ने जो संविधान के मुताबिक काम कर रही है। लेकिन राजनीतिक दलों को लगता है कि कोर्ट का फैसला ठीक नहीं, देश के एक राजनीतिक दल की नज़र संजू भाई पर पड़ी। जैसे उन्हें अपने लिए हीरा नज़र आ गया। और उठाकर बना दिया मुन्नाभाई को नेता। जैसे देश में नेतागिरी का ठेका दलाल, चोर, बदमाश और अपराधियों ने उठा रखा है। ऐसा नहीं कि अच्छे नेता नहीं, पर ये अच्चे नेता राजनीति की कीचड़ को साफ क्यों नहीं करते ? मेरी समझ से बाहर है।
कोई तो हो, जो ये काम करे। कोई दल, कोई नेता। कोई अपराधी नेता जब ए नाम की राजनीतिक पार्टी में होता है, तो बी पार्टी उसे कोसती है। लेकिन जब यही अपराधी नेता बी पार्टी में आता है, तो उसे डिफेंड करने लगती है। पता नहीं क्यों वोट का जुगाड़ करने के लिए ऐसे उम्मीदवार चुने जाते हैं, जो नोट और वोट का जुगाड़ एकसाथ कर सकें। चंद दिन पहले ही भारत के पूर्व उप राष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत ने कहा था कि राजनीतिक दल ऐसे उम्मीदवार चुन रहे हैं, जो नोट का जुगाड़ कर सकें। शेखावत ने कहा कि इससे पार्टियों में भ्रस्टाचार तेज़ी से बढ़ रहा है, और राजनीति में अच्छे लोग नहीं आ पा रहे।
शेखावत की बात बिल्कुल सही लगती है। पढ़े लिखे लोग वोट पॉलिटिक्स से दूर ही रहना पसंद करते हैं। यही वजह है कि जो भी नेता साफ छवि का है, या जोड़ तोड़ नहीं कर सकता वो राज्यसभा में जाकर बैठ जाता है। या फिर राजनीतिक दलों के मैनेजमेंट और प्रवक्ता की कुर्सी संभाल लेता है। और लड़ने यानि चुनाव लड़ने का काम लड़ाकू लोगों को मिल जाता है।.... और फिर ऐसे लोग ढूंढे जाते हैं, जो दबंग हों। या फिर किसी तरह से वोट का जुगाड़ कर एक सीट पक्की कर लें।
ऐसा नहीं है कि देश में सज़ायाफ्ता लोगों के चुनाव लड़ने से संबंधित कानून नहीं है। जन प्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 8 (3) के तहत दो साल से ज्यादा के सजायाफ्ता चुनाव नहीं लड़ सकते। लेकिन अक्सर इस कानून का भी फायदा उठाया जाता रहा है। अब इस फैसले के बाद उम्मीद बंधने लगी है, कि कम से कम सज़ायाफ्ता लोग चुनाव की दौड़ से बाहर रहेंगे।
हालांकि ऐसे लोग इसका भी तोड़ जानते हैं। ऐसे कई अपराधी नेता हैं, जो चुनाव नहीं लड़ सकते, सो उन्होने अपनी पत्नी, भाई या किसी और रिश्तेदार को चुनाव मैदान में उतार दिया है। यानि चेहरा बदल गया है, पर असल चीज़ में कोई बदलाव नहीं हुआ।
उम्मीद थी कि इस बार के चुनाव में राजनीतिक दल अपराधियों पर नकेल कसेंगे। लेकिन राजनीति की रसाकसी में अपराधियों के कपड़ों पर लगे खून के धब्बे किसी पार्टी को नज़र नहीं रहे। क़त्ल, लूटपाट, ब्लात्कार, चोरी, आगजनी, धोखाधड़ी, अपहरण और भी ना जाने कितने अपराध लादे नेता पार्टियों से टिकट मांगे फिर रहे हैं। एक पार्टी टिकट देने से मना करती है, तो वो आंख दिखाकर दूसरी पार्टी के दरवाजे चला जाता है। और अंतत: अपराध से सने लिपटे नेता टिकट पा रहे हैं। कोर्ट अधिक नहीं कर सकती। वो दो चार नेताओं पर नकेल कस सकती है। असल काम राजनीतिक दल कर सकते थे, लेकिन वो नहीं करते।

तो कौन करेगा राजनीति से इस कीचड़ को साफ ? अदालत ने अपना काम किया। अब हमारी बारी है।.... वोट वाले दिन हमें तय करना होगा कि वोट किसे दें ? एक अपराधी को........ जिसके दामन पर किसी गरीब के खून का धब्बा लगा है, या फिऱ ऐसे शख्स को जो ईमानदार है ?

खुद से एक सवाल पूछते रहिए ........... तब तक जब तक आप अपने वोट की ताकत से कुछ बदल ना दें।

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Monday, March 16, 2009

सर कलम कर दूंगा

'ये हाथ नहीं है, ये कमल की ताकत है जो किसी का सर कलम कर सकता है।'

"अगर कोई हिंदुओं की ओर हाथ बढ़ाता है या फिर ये सोचता हो कि हिंदू नेतृत्वविहीन हैं तो मैं गीता की कसम खाकर कहता हूँ कि मैं उस हाथ को काट डालूंगा।"

ये पढ़कर क्या ऐसा नहीं लगता कि कोई तालिबान की भाषा बोल रहा है ? तालिबान की भाषा पीलीभीत में।..... चुनाव के मौसम में अलगाव की भाषा। पर इससे भी ज़रुरी ये है कि ये सब कौन बोल रहा है ?... ये एक युवा नेता की आवाज़ है.... जो पांच साल पहले बेहद कम उम्र में संसद पहुंचा।.... अब वो पहले से ज़्यादा परिपक्व हो गया है।...... पहले उसका नाम बता दूं.... उसका नाम है.... वरुण गांधी।..... मेनका गांधी के बेटे हैं वरुण गांधी।............ और बीजेपी में राजनीति करते हैं।

उत्तर प्रदेश के पीलीभीत से भारतीय जनता पार्टी के उम्मीदवार वरुण गांधी ने चुनाव प्रचार के दौरान अपने भाषण में ये बातें कहीं। जिसके बाद चुनाव आयोग ने भड़काऊ भाषण देने के आरोप में उन्हें नोटिस जारी किया है।

वरुण गांधी पांच साल पहले राजनीति में आए तो सीधे संसद पहुंच गए।..... पांच साल संसद में नेतागिरी के दांवपेंच ने उन्हें सिखा दिया है कि वोट बैंक की राजनीति कैसे करनी है।.... 'ये हाथ नहीं है, ये कमल की ताकत है जो किसी का सर कलम कर सकता है।' ये शब्द जब वरुण गांधी के मुंह से निकल रहे होंगे.... तो सोचिए उनके ज़ेहन में क्या चल रहा होगा।.... हमारी युवा पीढ़ी का नेता ...... सर कलम करने की बात कह रहा है।
चुनाव जीतने के लिए क्या सर कलम करना ज़रुरी है ?.... क्या विकास और आगे बढ़ने के मुद्दों के साथ चुनाव नहीं जीते जा सकते ?.... चुनाव से ठीक पहले ये बड़ा सवाल है।...... वोटों के धुव्रीकरण से हमारे नेता कब तक कुर्सी हथियाते रहेंगे... क्या हमें ये नहीं सोचना चाहिए ?
मैं ब्राह्मण... मैं ठाकुर.... मैं बनिया.... मैं पिछड़ा.................... इन्हीं खांचों में बंटकर हम राजनीति के हाथ के खिलौने बन रहे हैं।.... हमारी आंखों के सामने पार्टियां राजनीति की बिसात बिछाती हैं।.... और फिर ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, पिछड़ा.... और भी ना जाने क्या-क्या ? .... उम्मीदवार हम पर थोप दिए जाते हैं।..... फिर मतदान के दिन क्या होता है ? ..... ब्राह्मण, ठाकुर, बनिया, पिछड़े सब घरों से निकलते हैं..... और बिना सोच विचार किए.... वोट देकर घर लौटते हैं।

अब अगर ये फॉर्मूला कारगर है, तो नेता इसका इस्तेमाल क्यों ना करें ? ज़ाहिर है... राजनीति में सत्ता के करीब पहुंचना ही सबसे बड़ा मंत्र है। इसके लिए क्या कुछ नहीं किया जाता। इसका इतिहास भी साक्षी रहा है।.... लेकिन हम नेता नहीं हैं... ना ही राजनीति में हैं।..... हम जनता हैं...... सच मायने में राजनीति को बदलने की काबिलियत हमारे पास है।.... लेकिन जब तक हम अलग-अलग हैं.... कुछ नहीं कर सकते।
तो रास्ता क्या है ?............ रास्ता एक ही है.... अलगाव की राजनीति करने वालों को मुंहतोड़ जवाब दिया जाए। सर कलम करने वालों को बताया जाए, कि किसी समुदाय का सर कलम करने की ताकत उनके पास नहीं है।..... इस बात को समझा जाए.... कि हम लड़कर नहीं चल सकते।..... अगर हम लड़ना भी चाहें, अपने हाथों में हथियार उठा भी लें..... तो क्या ये लड़ाई एक-दो दिन में ख़त्म हो जाएगी ?.... लड़ने की बात करना आसान है.... पर शांति के साथ आपस में मिलकर काम करना उतना ही मुश्किल।

तो क्यों आसानी के रास्ते पर चलकर हम अपने लिए मुश्किलें खड़ी कर लें ? ..... अफगानिस्तान, इराक, फिलिस्तीन का इतिहास गवाह है...... एक समुदाय दूसरे को कभी पूरी तरह नहीं कुचल सकता। तो क्यों इतिहास की अवहेलना की जाए ? इतिहास सबक लेने के लिए होता है। उसे भूलाकर फिर से दोहराने के लिए नहीं।...... अगर ये नेता इस बात को नहीं समझ सकते, तो क्या हमें (जनता को) भी ये बातें भूल जानी चाहिए ?...................... सवाल कई हैं.............. जवाब हमें ढूंढना है।..... अपने मन से पूछिए क्या गलत है.... और क्या सही ?

शायद आपको जवाब मिल जाए।

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