देश में बहुत तनाव है क्या, कुछ पता तो करो चुनाव है क्या?
सजग और संवेदनशील नहीं रहे, तो आपको समझ नहीं आएगा। आप उनका खेल कभी जान नहीं पाएंगे।
जब घटनाएं होंगी, तो आप खास लोगों द्वारा तय की गयी बातों पर यकीन करने
लगेंगे। वो सच पर चौतरफा घेरकर वार करते हैं। ये धूल भरी आंधी जैसा होता है। जिस
पल आंधी आए, आंखों के आगे धूल छा
जाती है। और कुछ पलों के लिए आंखें खोलना मुश्किल हो जाता है।
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बात को समझिए। गोयबल्स के प्रचार तंत्र के दो मुख्य बिंदु थे। पहला, झूठ ही सही, पर उसे बार बार बोलो। दूसरा, कुछ ‘खास बातों’ पर फोकस करो। ये खास बातें
उनका हथियार हैं; इसमें धर्म और राष्ट्रवाद
सबसे पैना हथियार है। नस्ल, भाषा, संस्कृति और जातिवादी पहचान भी उनके शस्त्रागार में शामिल
हैं। जैसा मौका हो, वो अपने लिए हथियार चुन लेते हैं।
याद रखिए, गोयबल्स ने हिटलर और
उसकी सत्ता के लिए जर्मनी और जर्मन्स की सर्वोच्चता को चुना। इसके अलावा जो कुछ बचा, वो शत्रु था।
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तो प्लान ये है कि झूठ सौ बार बोला जाए। सौ मुंह से कहा जाए।
झूठ अलग अलग दिशाओं से कहा जाएगा। झूठ अलग अलग माध्यमों से आपने सामने परोसा
जाएगा। संचार विज्ञानी मार्शल मैक्लुहान के शब्दों में कहें तो – द मीडियम इज द मैसेज, अर्थात “माध्यम ही संदेश” है।
तो क्या हो रहा है? झूठ, सामान्य बात बहस के जरिए आप तक पहुंच रहा है। अखबार और टेलीविजन चैनल्स के
जरिए आपको प्रभावित कर रहा है। फेसबुक, ट्विटर और वट्सऐप के जरिए आपके दिमाग पर छा रहा
है।
सिर्फ विवेक ही है, जो गोयबल्स से आपको बचाएगा। पर उसके लिए सजग रहना जरुरी है।
ढेर सारी कहानियां हैं, जो हमारे इर्दगिर्द बुनी जा रही हैं। कुछ प्रयोग चल रहे
हैं। इनमें कुछ सफल रहे, कुछ आंशिक रुप से सफल। पर ढेर सारे प्रयोग विफल भी हुए, क्योंकि प्रतिक्रिया नहीं
हुई।
जो कुछ घटा , या घटने वाला है। उसे स्वत: स्फूर्त घटनाओं का जामा पहनाया गया, आगे भी कोशिश जारी है। पर
गौर से इन घटनाओं को देखिए। इसमें एक खास पैटर्न दिखेगा। कुछ संगठनों का विचार और राजनीति
इसमें शामिल दिखेगी। शासन का एक बड़ा हिस्सा इसका साझीदार है। ऊपर से देखेंगे तो
शासन कहीं नहीं दिखेगा। लेकिन ये लुकाछिपी का खेल है। शासन और सत्ता में बैठे लोग
चुप रहेंगे। नीचे की फौज अपना काम करती रहेगी। एक खास तरह का झुंड घटनाओं में
सक्रिय भागीदार है। झूठ को तथ्य और सच बनाने के खेल में जाने अनजाने सूचना तंत्र भी
हिस्सेदार है।
कहानी लंबी है। और कई हैं। पहली कहानी उत्तर प्रदेश के बिजनौर की है।
बिजनौर में हिंदूओं के पलायन की एक कहानी गढ़ी गयी!
शायर राहत इंदौरी का एक शेर है। जिसमें शायर कहता है। “सरहदों पर बहुत तनाव है
क्या, कुछ पता तो करो
चुनाव है क्या?”
तो बात चुनाव की ही थी। कैराना में ऐसा चुनाव हुआ, जिसका असर 2019 तक होने
वाला है। कैराना और नूरपुर उपचुनाव से पहले बिजनौर से तनाव की एक खबर आई। शुरू में
ही कह दिया गया है कि सजग और संवेदनशील रहना जरुरी है। हर खबर पर यकीन भारी
परेशानी पैदा कर सकता है।
ये घटना 29 अप्रैल की है। कैराना और नूरपुर में उपचुनाव से ठीक एक महीने पहले बिजनौर
में वोटों के धुर्वीकरण की जबर्दस्त प्लानिंग की गयी। बिजनौर के गारवपुर गांव के बूढ़े बाबा
देवस्थल में एक बल्ली पर लगे लाडस्पीकर को प्रशासन ने उतार दिया। जिसके बाद गांव
में तनाव बढ़ा। मामला बढ़ा तो खास राजनीतिक दल से जुड़े हिंदू संगठन बीच में कूदे।
इन्होंने इस मामले को हिंदू मुस्लिम बनाने की कोशिश की। कहा गया कि गांव की मस्जिद
में भी लाउडस्पीकर लगे हैं। उन्हें क्यों नहीं हटाया जा रहा।
हिंदू संगठन के कूदने से विवाद ने नया रंग लिया। बूढ़े बाबा
देवस्थल कमेटी से जुड़े कुछ परिवार बैलगाड़ियों में अपना सामान भरकर गांव से बाहर
आ गए। इन परिवारों ने गांव से बाहर खेतों में तंबू गाड़ दिए।
हिंदू संगठन और कुछ सियासी लोगों ने मीडिया में इसे हिंदूओं
का पलायन बताया, और गांव में हिंदू-मुसलमानों के बीच खाई गहरी करने की कोशिश शुरू हुई। बिजनौर
से दूर बैठे मीडिया ने भी इसे उसी तरह दिखाने की कोशिश की, जैसा कुछ सियासी लोग चाहते थे। हेडलाइन्स चलाई
गई – बिजनौर में हिंदूओं का पलायन।
पुलिस और प्रशासन ने इन परिवारों से बात की, लेकिन हल नहीं निकला। ऐसे में भारतीय किसान यूनियन के
जिलाध्यक्ष चौधरी दिगंबर सिंह ने गांव के हिंदूओं और मुसलमानों से बातचीत की। भारतीय किसान यूनियन ने
दोनों पक्षों में समझौता कराया। समझौते के तहत मुसलमानों ने गांव में मंदिर बनवाने
और लाउडस्पीकर लगवाने की बात कही।
माहौल बिगाड़ने की कोशिश 29 अप्रैल को हुई। हिंदू संगठनों
ने हिंदू परिवारों को भड़काने की खूब कोशिश की। लेकिन भारतीय किसान यूनियन ने
एक खास राजनीतिक दल से जुड़े हिंदू संगठन की कोशिशों पर पानी फेर दिया। विवाद शुरू
होने के बाद ठीक सत्रहवें दिन गारवपुर गांव में हिंदू और मुसलमानों ने मिलकर शिव
मंदिर की नींव रखी। मंदिर की नींव रखने में गांव के मुस्लिम ग्राम प्रधान भी शामिल
हुए। इस तरह गारवपुर गांव के जरिए पूरे इलाके को हिंदू-मुस्लिम में बांटने का प्रयोग विफल हो गया।
बिजनौर के गारवपुर गांव की इस घटना में दो तीन बातों को गौर
से समझिए।
पहली बात, बूढ़े बाबा
देवस्थल से लाउडस्पीकर प्रशासन ने हटाया। मुसलमानों का इससे लेनादेना नहीं था।
दूसरी बात, हिंदू परिवार
लाउडस्पीकर हटाए जाने के बाद प्रशासन और सरकार से नाराज थे। मुसलमानों से नाराजगी
एक संगठन द्वारा मैन्यूफैक्चर की गई।
तीसरी बात, मुसलमानों का
लाउडस्पीकर से कोई लेना देना नहीं था। लेकिन हिंदू संगठन ने इसे मस्जिद के
लाउडस्पीकर से जोड़ा और फिर पूरे मामले को हिंदू-मुस्लिम रंग दे
दिया।
तारीफ करनी चाहिए, भारतीय किसान यूनियन की जिसने दोनों
पक्षों को हकीकत समझाई। दोनों पक्षों के लोगों की भी जिन्होंने समझा कि उन्हें
भड़काकर राजनीति की रोटी सेकी जा रही है।
इबादत को लड़ाई का मुद्दा कौन बना रहा है, और किसके लिए?
चुनाव कर्नाटक में भी हुए। हिंदू मुसलमान का मुद्दा सियासी नफे नुकसान का
मुद्दा है। कर्नाटक के बेंगलुरु से बाईस सौ किलोमीटर दूर गुरुग्राम में हिंदू-मुसलमान के विवाद को हवा
कौन दे रहा था, ये जानना चाहिए।
12 मई को कर्नाटक में वोट डाले गए। लेकिन इससे 22 दिन पहले 20 अप्रैल को
गुरुग्राम में हिंदू-मुसलमान का मुद्दा गरम करने की जमकर कोशिश हुई। गुरुग्राम के खाली पड़े प्लॉट
में मुसलमान दसियों साल से शुक्रवार के दिन नमाज पढ़ रहे थे। किसी हिंदू को कभी
फर्क नहीं पड़ा। लेकिन अचानक 20 अप्रैल को कुछ लोगों ने खाली पड़े प्लॉट पर नमाज
पढ़ने पर आपत्ति जताई। इन हुड़दंगियों ने नारेबाजी की। नमाज पढ़ रहे लोगों को बीच
नमाज उठा दिया। सालों से उस प्लॉट पर नमाज पढ़ रहे लोग शासन, प्रशासन से राहत की उम्मीद
करने पहुंचे। पुलिस के पास जाकर इन लोगों ने हुड़दंगियों की शिकायत दर्ज कराई।
पर शासन, प्रशासन की मुस्तैदी
देखिए। अगले कुछ दिनों में खाली पड़े प्लॉट पर एक नोटिस बोर्ड लग जाता है। पुलिस
प्लॉट की रखवाली में तैनात कर दी गयी। नमाजियों को उस खाली प्लॉट पर नमाज पढ़ने से
रोक दिया गया। इसी के बाद हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने कहा - सार्वजनिक और खुली जगहों पर
नमाज नहीं पढ़नी चाहिए। इशारा साफ है।
ईश्वर नमाजियों को आबाद रखे, उन्होंने हिंदूओं के ठेकेदार बने लोगों से भिड़ने के बारे
में नहीं सोचा। वो नारे लगाने के लिए मोर्चा बनाकर सड़क पर भी नहीं उतरे। मैं कहना
चाहता हूं कि आपने अच्छा किया, मेरे दोस्तों। यकीन मानिए, इससे उनका प्लान फेल हो
गया।
मुसलमानों की नमाज से हिंदुओं को दिक्कत कब से होने लगी?
गुरुग्राम में खुले में नमाज पढ़े जाने पर विवाद खड़ा किया गया, तो हिंदू संगठनों के साथ
साथ मीडिया वालों ने भी इस मुद्दे को लपक लिया। यहां वहां जहां भी जुमे के दिन
सड़क या खाली जगहों पर नमाज पढ़ी जाती है। कैमरे तैनात कर दिए गए।
वो जुमे का दिन था। ऐसा वहां हर जुमे को होता है। दिल्ली शहर के भजनपुरा का
सुभाष चौक। मस्जिद की मीनार से उठती अजान के साथ हजारों सिर एक साथ सजदे में गिरे, और फिर उठे। ये सब चंद
मिनटों के लिए बाजार की सड़क पर हुआ।
यूं समझो, वो सड़क 15 से 20
फीट की रही होगी। एक दो फीट ज्यादा या एक दो फीट कम। जिस सड़क पर मुसलमान ने घुटने
टेककर ऊपरवाले को याद किया। उसी सड़क के ओर छोर पर हिंदूओं की दुकानें लाइन से लगी
हुई थीं। बीच बीच में मुसलमानों की दुकानें भी हैं।
जब तक जुमे की नमाज चली।
दुकानें बंद रहीं। नमाज खत्म होने के बाद शटर ऊपर उठे। नमाज खत्म होने के बाद
रिपोर्टर ने हिंदू दुकानदार से पूछा – सड़क पर मुसलमान नमाज पढ़ते हैं, आपको कई परेशानी नहीं होती? हिंदू दुकानदार ने जवाब
दिया। कोई परेशानी नहीं
है। कितना टाइम लगता है। ज्यादा से ज्यादा आधा घंटा। आधे घंटे में क्या हो जाता है? कुछ भी नहीं। यही लोग हमारे कस्टमर हैं।
यही लोग आते हैं मेरे पास।
एक दूसरे हिंदू दुकानदार ने इस सवाल के जवाब में
कहा। हम लोगों को इसमें कोई प्रॉब्लम नहीं है। ये 10 मिनट का काम होता है, हफ्ते में एक दिन। किसी को कोई प्रॉब्लम
नहीं है
रिपोर्टर
मुसनमानों की तरफ मुड़ा। मुस्लिम भाई बोला। हमारे हिंदू भाई हैं। देश सभी का है।
उनका आरती भजन होता है, तो हम लोग जगह देते हैं। वो आगे बोला। हिंदू नमाज़ के लिए चटाई बिछाते हैं। वजू के
लिए पानी देते हैं। 10 मिनट के लिए क्या होता है?
वो काले झंडे वाले ‘काले लोग’ !
असम के उन काले झंडों से निकला झूठ न खुलता, तो न जाने कितने लोग असम के
मुसलमानों को आईआईएस का आतंकी ही मानते। झूठ बेपर्दा हुआ है, तो पता चला है कि आईएसआईएस
के वो काले झंडे आतंकियों के कारस्तानी नहीं थे। वो एक प्लान का हिस्सा था। प्लान
था,
एक खास धर्म के लोगों को
आतंकी के तौर पर प्रचारित किया जाए। योजना अच्छी थी। पर भेद खुल गया।
मामला तीन मई का है। असम के नलबाड़ी में आईएसआईएस के झंडे पेड़ पर लटके मिले
थे। मीडिया ने इस खबर की पड़ताल किए बिना इसे मुसलमानों से जोड़ा। खबरों में बताया
गया कि असम के मुसलमान आईएसआईएस से जुड़े हैं। और झंडे इन्हीं मुसलमानों ने लगाए
हैं।
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक पुलिस ने तफ्तीश शुरू की, तो चार दिन बाद 7 मई को
पुलिस ने नलबाड़ी के बेल्सोर इलाके से बीजेपी से जुड़े छह लोगों को पकड़ा। पुलिस
को शक है कि झंडे इन्हीं लोगों ने लगाए। मकसद क्या रहा होगा, ये समझना क्या मुश्किल है?
हिंदू-मुसलमान के बंटवारे की सियासी चाल को समझिए
ये जो घटनाएं हैं। अगर आप इसे एक संयोग मानते हैं? तो आप गलत सोच रहे हैं। यकीन
मानिए, ये प्लानिंग के साथ
डिजाइन किया जा रहा है। इस योजना का हर कदम सोच समझकर रखा जा रहा है। आपको समझ
नहीं आएगा असल में इसके पीछे कौन है? क्योंकि सत्ता में बैठे लोग सिर्फ देख रहे हैं।
वो भाषणों में सबके साथ होने और सबका कल्याण करने की बातें करेंगे। पर उनके नीचे
तमाम संगठन फैले हैं। कोई गोरक्षा के नाम पर सड़क पर मुसलमान को पकड़कर पीट देगा।
कई लव जिहाद के नाम पर हंगामा करेगा। कोई नमाज के नाम पर हुड़दंग मचाएगा।
सबसे ऊपर बैठे लोग कुछ नहीं कहेंगे। क्योंकि इसका सीधा फायदा उन्हीं को चुनाव दर
चुनाव मिलने की उम्मीद है।
और अंत में नब्बे साल पहले वाले जर्मनी से सबक लेना जरुरी है। वहां जर्मन्स के
सियासी इस्तेमाल के लिए हिटलर के नेतृत्व में गोयबल्स ने जो तरीका अपनाया। वो बड़ा
खतरनाक था। यहूदियों के खिलाफ लोगों को भड़काया गया। चर्चों पर हमले की बातें
प्रमुखता से उभारी गयी। इनमें से ज्यादातर बातें अफवाह थी। कई बार उसने चर्चों पर हिटलर
के लोगों ने खुद ही हमले करवाए और इसका इस्तेमाल यहूदियों के खिलाफ प्रोपेगैंडा के
तौर पर किया गया।
कुछ समझ आ रहा है आपको या नहीं?
Labels: अफवाह, कैराना, गोयबल्स, प्रचार, बिजनौर, राष्ट्रवाद, हिंदू मुसलमान

